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Chhatarpur Matka: छतरपुर के देशी फ्रिज की डिमांड , लेकिन सरकार की बेरुखी क्यों...?

Chhatarpur Matka: छतरपुर के देशी फ्रिज की डिमांड , लेकिन सरकार की बेरुखी क्यों...?

Chhatarpur Matka: गर्मी का मौसम शुरू होते ही छतरपुर के मिट्टी के मटकों की मांग एक बार फिर तेज हो गई है। ‘देशी फ्रिज’ और प्राकृतिक फिल्टर के रूप में पहचान बना चुके ये मटके न सिर्फ मध्यप्रदेश बल्कि उत्तर प्रदेश के कई शहरों में भी बड़ी मात्रा में सप्लाई किए जा रहे हैं। कोरोना काल के बाद लोगों का झुकाव फ्रिज के ठंडे पानी की बजाय मटके के प्राकृतिक और स्वास्थ्यवर्धक पानी की ओर बढ़ा है, जिससे हर घर में इनकी डिमांड देखी जा रही है।

जोरो पर मटकों की बिक्री

छतरपुर के पन्ना नाका, कॉलेज तिराहा, बस स्टैंड और महोबा रोड जैसे प्रमुख स्थानों पर मटकों की बिक्री जोरों पर है। बाजार में छोटे-बड़े मटकों की कीमत 50 रुपये से लेकर 300 रुपये तक है, जबकि सामान्य घड़ा 60 से 100 रुपये में मिल रहा है। टोटी वाले और बिना टोटी वाले मटकों की विशेष मांग बनी हुई है।

मेहनत ज्यादा, मुनाफा कम

हालांकि बढ़ती मांग के बावजूद कारीगरों की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं हो पा रही है। मटके बनाने वाले कारीगर बताते हैं कि इस काम में मेहनत और लागत दोनों ही ज्यादा हैं, लेकिन मुनाफा बेहद कम मिलता है। मटका तैयार करने की प्रक्रिया भी काफी जटिल होती है। मिट्टी को भिगोना, छानना, उसमें गोबर कंडे की राख मिलाना, आकार देना, सुखाना और फिर रंगाई-पुताई करना हर चरण में मेहनत लगती है। कारीगरों के अनुसार काली मिट्टी से बने मटके ज्यादा मजबूत और ठंडक बनाए रखने में बेहतर होते हैं। लेकिन मिट्टी भी उन्हें बाजार से महंगे दामों पर खरीदनी पड़ती है। एक ट्रॉली मिट्टी की कीमत करीब 3 हजार रुपये तक पहुंच जाती है, जिससे लागत और बढ़ जाती है।

दो महीने काम, पूरे साल गुजारा

छतरपुर के रावतन मोहल्ले एवं सटई रोड़ के कारीगरों का कहना है कि यह उनका पारंपरिक व्यवसाय है और उन्हें इसके अलावा कोई अन्य काम नहीं आता। मटकों का सीजन केवल दो महीने का होता है, जिससे पूरे साल का गुजारा करना मुश्किल हो जाता है। कारीगरों ने सरकार से मांग की है कि यदि इस पारंपरिक कला को प्रोत्साहन दिया जाए और ‘माटी कला बोर्ड’ जैसी योजनाओं का लाभ उन्हें मिले, तो इसे उद्योग के रूप में विकसित किया जा सकता है। फिलहाल कई कारीगरों को इन योजनाओं की जानकारी तक नहीं है, जिससे वे सरकारी मदद से वंचित हैं। चिलचिलाती गर्मी में मटके का पानी जहां लोगों को राहत देता है, वहीं यह पारंपरिक हुनर आज भी अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है।

कारीगरों को नही माटी कला बोर्ड योजना की जानकारी 

मिट्टी के बर्तन के कारीगर का कहना है "यह काम हम लोगों का पुस्तैनी है, बड़ी मेहनत लगती है, एक दिन में 10 ही मटके बनते हैं, महीनों पहले से काम शुरू हो जाता है, छतरपुर के मटकों की मांग कई शहरों में है." वहीं हमेशा मिट्टी के मटके के पानी पीने वाले "घर में वैसे तो फ्रिज है लेकिन कोरोना काल के बाद हम लोगों ने फ्रिज का पानी पीना बंद कर दिया है, उनके जैसे बहुत लोग हैं जो अब केवल मटके का ही पानी पीते हैं, ये पानी सेहत के लिए लाभदायक भी है, मिट्टी के मटके का पानी शीतलता से भरपूर होता है, ना ज्यादा ठंडा और ना गर्म." वहीं, मिट्टी के कारीगरों की समस्या को लेकर छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवालका कहना है "माटी कला बोर्ड योजना के तहत इन कारीगरों को लाभ दिया जाता है, जो लोग इस काम को करते हैं उन्हें आवेदन करना चाहिए, हरेक पात्र व्यक्ति को लाभ मिलेगा."


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