छत्तीसगढ़ में शिक्षा को लेकर एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है। लगातार बढ़ती जनसंख्या के बीच राज्य में निरक्षर लोगों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती नजर आ रही है। यह स्थिति तब है, जब प्रदेश में वर्षों से साक्षरता बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं और गांव-गांव तक स्कूलों का विस्तार किया जा रहा है।
आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों में यह स्पष्ट हुआ है कि 2011 की जनगणना के बाद से लेकर वर्ष 2026 तक राज्य की निरक्षर आबादी में वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इन आंकड़ों को हर साल बढ़ने वाली जनसंख्या के आधार पर तैयार किया गया है, जिसमें प्रदेश के सभी 33 जिलों की स्थिति को शामिल किया गया है।
बढ़ती आबादी, धीमी शिक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी गति से शिक्षा का विस्तार नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि निरक्षर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।
हालांकि सरकार ने प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन इनका असर सभी क्षेत्रों में समान रूप से नहीं दिख रहा है। ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में अब भी शिक्षा की पहुंच सीमित बनी हुई है।
कुल निरक्षर आबादी में इजाफा
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2011 में छत्तीसगढ़ में निरक्षर लोगों की संख्या लगभग 1 करोड़ 1 लाख के आसपास थी। वहीं 2026 तक यह आंकड़ा बढ़कर करीब 1 करोड़ 4 लाख से अधिक होने का अनुमान है। यह वृद्धि भले ही प्रतिशत के हिसाब से बहुत बड़ी न लगे, लेकिन यह संकेत देती है कि शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षित सुधार अभी नहीं हो पाया है।
बड़े जिलों में भी स्थिति बेहतर नहीं
राजधानी रायपुर और बिलासपुर जैसे प्रमुख जिलों में भी निरक्षरता के आंकड़ों में वृद्धि देखी गई है। बिलासपुर में निरक्षर लोगों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि कबीरधाम जिले में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि शहरी क्षेत्रों में भी शिक्षा की पहुंच और गुणवत्ता पर ध्यान देने की जरूरत है।
कुछ जिलों ने दिखाई सकारात्मक दिशा
हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। राज्य के कुछ जिलों में साक्षरता के क्षेत्र में बेहतर काम हुआ है। दुर्ग जिले में निरक्षर लोगों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। कोरबा जैसे औद्योगिक जिले में भी शिक्षा के क्षेत्र में सुधार देखा गया है। इसके अलावा दंतेवाड़ा, धमतरी और बालोद जैसे जिलों में भी निरक्षरता घटने के संकेत मिले हैं। यह दर्शाता है कि जहां योजनाओं का सही तरीके से क्रियान्वयन हुआ, वहां परिणाम भी सकारात्मक मिले हैं।
नए जिलों में चुनौती बरकरार
राज्य के नए और तेजी से विकसित हो रहे जिलों में अभी भी शिक्षा के क्षेत्र में कई चुनौतियां बनी हुई हैं। इन क्षेत्रों में स्कूलों की कमी, शिक्षकों की उपलब्धता और जागरूकता की कमी जैसे कारणों से साक्षरता दर प्रभावित हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन जिलों के लिए अलग रणनीति बनाकर काम करने की जरूरत है, ताकि शिक्षा का स्तर बेहतर हो सके।
आगे क्या करना होगा?
राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शिक्षा को हर वर्ग और हर क्षेत्र तक समान रूप से पहुंचाया जाए। केवल स्कूल खोलना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता और जागरूकता दोनों पर ध्यान देना जरूरी है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में निरक्षरता की समस्या और गंभीर हो सकती है।