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RigTo Recall: जनता को मिला चुने हुए प्रतिनिधि को हटाने का अधिकार, जानिए कैसे होती है वोटिंग और क्या हैं नियम

RigTo Recall: जनता को मिला चुने हुए प्रतिनिधि को हटाने का अधिकार, जानिए कैसे होती है वोटिंग और क्या हैं नियम

मध्यप्रदेश: लोकतंत्र में आमतौर पर जनता मतदान करके अपने प्रतिनिधियों को चुनती है और उन्हें पांच साल तक काम करने का मौका देती है। लेकिन क्या आपको पता है कि कुछ राज्यों में जनता के पास अपने चुने हुए प्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार भी है? इस व्यवस्था को राइट टू रिकॉल (Right To Recall) कहा जाता है।

हाल ही में मध्यप्रदेश के निवाड़ी जिले के जेरोन खालसा नगर परिषद में इसी व्यवस्था के तहत अध्यक्ष कुसुम पस्तोर के खिलाफ मतदान कराया गया। उन पर अपेक्षित विकास कार्य नहीं कराने और जनता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने के आरोप लगाए गए। इस मामले में 15 में से 12 पार्षदों ने अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था। इसके बाद नगर परिषद क्षेत्र में मतदान कराया गया।

इस चुनाव में मतदाताओं को किसी नए उम्मीदवार को चुनने के बजाय यह फैसला करना था कि मौजूदा अध्यक्ष को पद पर बनाए रखा जाए या उन्हें हटा दिया जाए। ऐसे में आइए समझते हैं कि राइट टू रिकॉल क्या है, भारत में यह किन पदों पर लागू होता है और इसके तहत किसी जनप्रतिनिधि को हटाने की पूरी प्रक्रिया क्या है।

क्या है राइट टू रिकॉल?

राइट टू रिकॉल एक ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जिसके तहत मतदाताओं को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को उसका कार्यकाल पूरा होने से पहले पद से हटाने का अधिकार मिलता है। इसका उद्देश्य जनप्रतिनिधियों को उनके कामकाज के प्रति जवाबदेह बनाना है।

इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। मान लीजिए किसी नगर परिषद में जनता ने पांच साल के लिए अध्यक्ष चुना है। लेकिन कार्यकाल के दौरान लोगों को लगता है कि अध्यक्ष क्षेत्र का विकास नहीं करा रहे हैं, समस्याओं का समाधान नहीं कर रहे हैं या अपने चुनावी वादों को पूरा करने में विफल रहे हैं। सामान्य चुनाव व्यवस्था में जनता को अगले चुनाव तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं, राइट टू रिकॉल की व्यवस्था वाले राज्यों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी करके उस प्रतिनिधि को समय से पहले हटाया जा सकता है।

क्या भारतीय संविधान में है राइट टू रिकॉल का प्रावधान?

भारतीय संविधान में राइट टू रिकॉल को मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट मान्यता नहीं दी गई है। हालांकि, राज्यों के कानूनों और स्थानीय निकायों से जुड़े प्रावधानों के माध्यम से इस व्यवस्था को लागू किया गया है। भारत में इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं में देखने को मिलता है। अलग-अलग राज्यों में इसके नियम और पात्र पद अलग-अलग हो सकते हैं।

किन जनप्रतिनिधियों को हटाने के लिए हो सकता है इस्तेमाल?

राइट टू रिकॉल की व्यवस्था सभी निर्वाचित पदों पर लागू नहीं होती। भारत में यह मुख्य रूप से स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं से जुड़े पदों के लिए लागू है। इसके दायरे में अलग-अलग राज्यों के कानूनों के अनुसार नगर परिषद अध्यक्ष, नगर पालिका अध्यक्ष, नगर पंचायत अध्यक्ष, ग्राम पंचायत के सरपंच, पंचायतों के अन्य निर्वाचित प्रतिनिधि इस पद के अंतर्गत आते हैं। हालांकि, सांसद और विधायक को हटाने के लिए भारत में इस तरह की सामान्य राइट टू रिकॉल व्यवस्था लागू नहीं है।

भारत के किन राज्यों में लागू है यह व्यवस्था?

देश के सभी राज्यों में राइट टू रिकॉल का एक जैसा कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने स्थानीय निकायों और पंचायतों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को हटाने के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान किए हैं। इन राज्यों में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और बिहार जैसे राज्य शामिल हैं। हालांकि, प्रत्येक राज्य में किन पदों पर यह व्यवस्था लागू होगी और इसकी प्रक्रिया क्या होगी, यह संबंधित राज्य के कानून पर निर्भर करता है।

कलेक्टर से निर्वाचन आयोग तक कैसे पहुंचता है प्रस्ताव?

पार्षदों का आवश्यक समर्थन मिलने के बाद प्रस्ताव को जिले के कलेक्टर के पास प्रस्तुत किया जाता है। इसके बाद प्रस्ताव और उससे संबंधित दस्तावेजों की जांच की जाती है।

प्रक्रिया को आसान भाषा में इस तरह समझ सकते हैं:

नगर परिषद के निर्धारित संख्या में निर्वाचित पार्षद अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव लाते हैं।

प्रस्ताव को आवश्यक हस्ताक्षरों के साथ कलेक्टर के समक्ष पेश किया जाता है।

कलेक्टर प्रस्ताव और निर्धारित कानूनी शर्तों की जांच करते हैं।

नियमानुसार प्रस्ताव को राज्य सरकार के समक्ष भेजा जाता है।

राज्य सरकार की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मामला राज्य निर्वाचन आयोग तक पहुंचता है।

निर्वाचन आयोग मतदान की तारीख और चुनाव संबंधी व्यवस्थाएं तय करता है।

निर्धारित क्षेत्र में मतदाताओं के बीच मतदान कराया जाता है।

इस तरह राइट टू रिकॉल की प्रक्रिया में आम जनता सीधे प्रस्ताव पेश नहीं करती, बल्कि निर्धारित नियमों के तहत निर्वाचित पार्षद इसकी शुरुआत करते हैं। अंतिम फैसला मतदान के जरिए होता है।

राइट टू रिकॉल चुनाव में कैसे होती है वोटिंग?

अब सवाल उठता है कि आखिर इस तरह के चुनाव में मतदाता वोट कैसे डालते हैं? क्या सामान्य चुनाव की तरह उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न होते हैं?

दरअसल, राइट टू रिकॉल चुनाव में मतदाताओं के सामने दो विकल्प रखे जाते हैं। इन विकल्पों को चुनाव चिह्नों के माध्यम से दर्शाया जाता है।

1. भरी हुई कुर्सी: इसका मतलब है कि मतदाता मौजूदा अध्यक्ष को पद पर बनाए रखना चाहता है।

2. खाली कुर्सी: इसका अर्थ है कि मतदाता मौजूदा अध्यक्ष को पद से हटाने के पक्ष में है।

मतदाता इन दोनों में से किसी एक विकल्प को चुनकर अपना वोट डालते हैं। इस चुनाव में संबंधित नगर परिषद या निकाय क्षेत्र के पात्र मतदाता हिस्सा लेते हैं। जेरोन खालसा नगर परिषद में भी अध्यक्ष को हटाने के लिए पूरे नगर परिषद क्षेत्र में मतदान कराया गया था। यहां कुल 7,799 मतदाता थे, जिनमें से 4,798 लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया।

कितने वोट मिलने पर अध्यक्ष की कुर्सी बचती है या चली जाती है?

राइट टू रिकॉल चुनाव का सबसे अहम पहलू इसका परिणाम होता है। मतदान के बाद भरी हुई और खाली कुर्सी के पक्ष में पड़े वोटों की गिनती की जाती है। यदि भरी हुई कुर्सी के पक्ष में निर्धारित बहुमत मिल जाता है तो मौजूदा अध्यक्ष अपने पद पर बने रहते हैं। वहीं, यदि खाली कुर्सी के पक्ष में आवश्यक मत प्राप्त होते हैं तो अध्यक्ष को पद छोड़ना पड़ता है।  

क्या राइट टू रिकॉल चुनाव में भी होता है प्रचार?

सामान्य विधानसभा, लोकसभा या निकाय चुनावों की तरह राइट टू रिकॉल चुनाव में नए उम्मीदवारों के बीच मुकाबला नहीं होता। इसलिए यहां प्रचार का स्वरूप भी अलग होता है। इस चुनाव में पूरा जोर मौजूदा अध्यक्ष के कामकाज और उनके कार्यकाल के दौरान किए गए विकास कार्यों पर रहता है। अध्यक्ष को हटाने के पक्ष में रहने वाले लोग जनता के बीच जाकर बताते हैं कि क्षेत्र में विकास कार्य नहीं हुए, स्थानीय समस्याएं बनी हुई हैं और अध्यक्ष जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रहे हैं। वहीं, अध्यक्ष को पद पर बनाए रखने के समर्थक उनके कामकाज और उपलब्धियों को सामने रखते हैं।  

राइट टू रिकॉल क्यों है महत्वपूर्ण?

राइट टू रिकॉल को स्थानीय लोकतंत्र में जवाबदेही बढ़ाने वाली व्यवस्था के तौर पर देखा जाता है। इसके जरिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह संदेश मिलता है कि चुनाव जीतने के बाद उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती, बल्कि उन्हें पूरे कार्यकाल में जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप काम करना होता है। हालांकि, इस व्यवस्था का इस्तेमाल निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के कामकाज के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है।  


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