नेपाल: Nepal Tunnel Rescue: नेपाल के रासुवा जिले में बाढ़ और मलबे के बीच त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग से दो मजदूरों को 10 दिन बाद सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। इस असाधारण बचाव अभियान को टनल रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स ने बेहद दुर्लभ और ऐतिहासिक बताया है। इस सफलता के बाद सुरंग में फंसे अन्य मजदूरों के सुरक्षित मिलने की उम्मीद भी बढ़ गई है।
क्या है पूरा मामला?
नेपाल के रासुवा जिले में 26 अगस्त को भोटे कोशी नदी में अचानक आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। तेज बहाव के साथ बड़े-बड़े पत्थर, कीचड़ और मलबा हाइड्रोपावर परियोजना की सुरंगों में जा घुसे। इससे सुरंग का बड़ा हिस्सा अवरुद्ध हो गया और कई मजदूरों के अंदर फंसे होने की आशंका पैदा हुई। नेपाल सेना की अगुवाई में राहत और बचाव दल ने इसके बाद बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन शुरू किया। चुनौती बेहद कठिन थी, क्योंकि सुरंगों में पानी, कीचड़ और भारी चट्टानों के कारण बचाव दल के लिए आगे बढ़ना आसान नहीं था।
10 दिन बाद दो मजदूर मिले जिंदा
लगातार चलाए गए रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान दो मजदूरों को सुरंग के भीतर से जीवित बाहर निकाल लिया गया। करीब 10 दिनों तक अंधेरे और बेहद मुश्किल परिस्थितियों में टिके रहने के बाद दोनों की सुरक्षित वापसी ने बचाव दल में नई उम्मीद पैदा कर दी। बताया गया कि दोनों मजदूरों ने उपलब्ध सीमित पानी और भोजन के सहारे इतने लंबे समय तक खुद को जीवित रखा। उनकी हिम्मत और विपरीत परिस्थितियों में धैर्य ने इस अभियान को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है।
अर्नोल्ड डिक्स ने क्यों बताया इसे असाधारण?
उत्तराखंड के सिलक्यारा सुरंग बचाव अभियान के दौरान अपनी विशेषज्ञ भूमिका के कारण चर्चित हुए टनल रेस्क्यू विशेषज्ञ अर्नोल्ड डिक्स नेपाल के इस अभियान को दूर से तकनीकी मार्गदर्शन दे रहे हैं। डिक्स के मुताबिक, एक साथ कई पावर स्टेशन प्रभावित होने और कई सुरंगों में बचाव अभियान चलने की वजह से यह ऑपरेशन बेहद जटिल है। उनके अनुसार, सुरंग में मौजूद बड़े बोल्डरों को हटाने के लिए कई जगह भारी चट्टानों को ब्लास्ट करके रास्ता बनाने जैसी चुनौती का सामना करना पड़ा। उनका मानना है कि इस तरह की परिस्थितियों में एक साथ इतने बड़े स्तर पर सुरंगों में बचाव अभियान चलना बेहद दुर्लभ है।
'गोल्डीलॉक्स जोन' ने जगाई उम्मीद
अर्नोल्ड डिक्स की एक अहम थ्योरी 'गोल्डीलॉक्स जोन' को लेकर थी। इसका मतलब सुरंग के ऐसे हिस्सों से है जहां परिस्थितियां पूरी तरह सुरक्षित तो नहीं होतीं, लेकिन वहां फंसे लोगों के कुछ समय तक जीवित रहने की संभावना बनी रह सकती है। दो मजदूरों का 10 दिन बाद जीवित मिलना इस संभावना को मजबूत करता है कि सुरंग के भीतर कुछ ऐसे स्थान मौजूद हो सकते हैं जहां लोग बाढ़ के सीधे प्रभाव से बच गए हों।यही वजह है कि बचाव दल अब सुरंग के अन्य हिस्सों में भी फंसे लोगों की तलाश को लेकर ज्यादा उम्मीद के साथ अभियान चला रहा है।
मलबे ने कैसे बचाई मजदूरों की जान?
अर्नोल्ड डिक्स के आकलन के मुताबिक, बाढ़ का पानी और मलबा तेजी से सुरंग में घुसा होगा। ऐसे में मजदूरों ने संभवतः पानी के बहाव से बचने के लिए सुरंग के ऊंचे हिस्सों की ओर जाने की कोशिश की होगी। इसके बाद बड़े पत्थरों, कीचड़ और मलबे ने सुरंग के रास्ते को बंद कर दिया। पहली नजर में यही मलबा मजदूरों के लिए सबसे बड़ा खतरा था, लेकिन परिस्थितियों ने एक अप्रत्याशित भूमिका निभाई। मलबे के अवरोध ने पानी के तेज बहाव को अंदर तक पहुंचने से रोक दिया होगा, जिससे सुरंग के एक हिस्से में मौजूद मजदूर डूबने से बच सके। इसी वजह से उन्हें लंबे समय तक अंदर जीवित रहने का मौका मिला।
अब बाकी मजदूरों की तलाश पर नजर
दो मजदूरों के सुरक्षित बाहर आने के बाद सुरंग में फंसे अन्य लोगों को लेकर उम्मीद बढ़ गई है। त्रिशूली-3ए सुरंग में करीब 35 अन्य मजदूरों के फंसे होने की आशंका जताई जा रही है। वहीं, नदी घाटी में बाढ़ से प्रभावित अन्य पावर प्रोजेक्ट्स को मिलाकर करीब 150 लोगों के लापता होने की बात सामने आई है। राहत और बचाव दल लगातार मलबा हटाने तथा संभावित जीवित लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।