देश में बढ़ते मेडिकल खर्च और निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने के लिए संसदीय स्थायी समिति ने कई अहम सुझाव दिए हैं। समिति की सिफारिशों में सबसे प्रमुख प्रस्ताव यह है कि बड़े शहरों में प्राइवेट अस्पताल के बेसिक कमरे का किराया आसपास के 3-स्टार होटल के औसत कमरे के किराए से अधिक नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसदीय स्थायी समिति की 176वीं रिपोर्ट में हेल्थकेयर को अधिक किफायती और पारदर्शी बनाने के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं। रिपोर्ट 7 अगस्त को राज्यसभा में पेश की गई थी और लोकसभा में भी रखी गई।
3-स्टार होटल के किराए को बनाया जाए बेंचमार्क
समिति ने बड़े शहरों में प्राइवेट अस्पतालों के कमरे के किराए के लिए 3-स्टार होटल की दर को एक मानक बनाने की सिफारिश की है। समिति के मुताबिक बेसिक रूम के किराए में रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग, डिस्पोजेबल सामान, भोजन और लॉन्ड्री जैसी सुविधाओं की लागत को शामिल किया जा सकता है। समिति का मानना है कि अस्पतालों में कमरे की कैटेगरी के आधार पर अलग-अलग शुल्क लेने और उससे जुड़े अतिरिक्त चार्ज के कारण मरीजों का कुल बिल काफी बढ़ जाता है। ऐसे में अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की जरूरत है।
इलाज शुरू होने से पहले बताना होगा अनुमानित खर्च
समिति ने सिर्फ कमरे के किराए पर ही नहीं, बल्कि पूरे इलाज की लागत को लेकर भी महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। इसके अनुसार टर्शियरी केयर हॉस्पिटल को किसी जटिल या लंबे इलाज की शुरुआत से पहले मरीज और उसके परिवार को कुल संभावित खर्च का विस्तृत और कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुमान देना चाहिए। इससे मरीजों को इलाज शुरू होने से पहले यह समझने में मदद मिलेगी कि उन्हें कितना खर्च उठाना पड़ सकता है और इलाज के दौरान अचानक बढ़ने वाले बिल से आर्थिक झटका कम किया जा सकेगा।
अस्पतालों में फाइनेंशियल नेविगेटर की सिफारिश
समिति ने प्राइवेट अस्पतालों में फाइनेंशियल नेविगेटर नियुक्त करने का भी सुझाव दिया है। इनकी भूमिका मरीजों और उनके परिवारों को इलाज की लागत, उपलब्ध चैरिटी सहायता और हेल्थ इंश्योरेंस की कवरेज व सीमाओं को समझाने की होगी। रिपोर्ट के मुताबिक निजी स्वास्थ्य सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले परिवारों पर इलाज का आर्थिक दबाव काफी अधिक होता है। अस्पताल में भर्ती होने पर प्रति बार औसत खर्च करीब 34,064 रुपये बताया गया है।
मेडिकल महंगाई और कमरे की कैटेगरी पर भी चिंता
समिति ने हेल्थकेयर सेक्टर में करीब 10 से 13 प्रतिशत मेडिकल महंगाई का उल्लेख किया है। इसके अलावा अस्पतालों में कमरे की अलग-अलग श्रेणियों के आधार पर इलाज की कीमतों में अंतर को लेकर भी चिंता जताई गई है। समिति ने स्टैंडर्ड मेडिकल प्रक्रियाओं के लिए कमरे की कैटेगरी से जुड़ी कीमतों में अंतर को खत्म करने और मनमाने तरीके से शुल्क बढ़ाने पर रोक लगाने के लिए मानकीकृत इलाज प्रक्रिया लागू करने की सिफारिश की है।
‘कंटीन्यूम ऑफ केयर’ पैकेज का प्रस्ताव
समिति ने मरीजों को लंबे समय तक वित्तीय सुरक्षा देने के लिए ‘कंटीन्यूम ऑफ केयर’ पैकेज लागू करने का सुझाव दिया है। इसमें प्रिवेंटिव स्क्रीनिंग, डायग्नोस्टिक्स, इलाज और पैलिएटिव केयर को एक तय वित्तीय दायरे में शामिल करने की बात कही गई है। समिति के मुताबिक वित्तीय सुरक्षा केवल सर्जरी या गंभीर बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसमें फॉलो-अप, रिहैबिलिटेशन और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल को भी शामिल किया जाना चाहिए।
कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के लिए हेल्थकेयर कॉर्पस फंड
कैंसर और दुर्लभ बीमारियों के महंगे इलाज को लेकर भी समिति ने अहम सुझाव दिया है। इम्यूनोथेरेपी, जीनोमिक और टारगेटेड ट्रीटमेंट जैसी महंगी चिकित्सा के लिए रेगुलेटेड नेशनल या स्टेट हेल्थकेयर कॉर्पस फंड बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस फंड में CSR योगदान, चैरिटी और अनुदान से राशि जुटाई जा सकती है। इसका इस्तेमाल पात्र मरीजों के महंगे इलाज या थेरेपी की लागत को पूरी तरह अथवा आंशिक रूप से वहन करने में किया जा सकता है।
गंभीर बीमारियों में काउंसलिंग और भावनात्मक सहायता भी जरूरी
समिति ने गंभीर, पुरानी और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, भावनात्मक सहयोग और मरीज सहायता समूहों को इलाज के निर्धारित पैकेज का हिस्सा बनाने की सिफारिश की है। यह सुविधा सरकारी और निजी, दोनों तरह के अस्पतालों में मरीजों को बिना अतिरिक्त शुल्क उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है।
जन औषधि और AMRIT फार्मेसी पर जोर
दवाओं और मेडिकल डिवाइस की कीमत कम करने के लिए समिति ने आयुष्मान भारत PM-JAY के तहत आने वाले सभी अस्पतालों में AMRIT और जन औषधि फार्मेसी अनिवार्य करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही प्राइवेट अस्पतालों में खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी और टेंडर आधारित बनाने तथा जीवन रक्षक सामान और मेडिकल डिवाइस पर मार्क-अप की सीमा तय करने की बात कही गई है।
सरकारी अस्पतालों में ‘जीरो-स्टॉकआउट’ पॉलिसी
समिति ने सरकारी अस्पतालों में ‘जीरो-स्टॉकआउट पॉलिसी’ लागू करने की सिफारिश भी की है। इसके लिए डिजिटल इन्वेंट्री सिस्टम की मदद लेने का सुझाव दिया गया है, ताकि जरूरी दवाएं, महंगे मेडिकल उपकरण और सर्जिकल इम्प्लांट समय पर उपलब्ध रहें। हेल्थ इंश्योरेंस के क्षेत्र में भी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्राइवेट अस्पतालों और हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स को नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज से जोड़ने की सिफारिश की गई है। साथ ही क्लेम विवाद, फर्जी बिलिंग और धोखाधड़ी को कम करने के लिए पब्लिक इंश्योरेंस रजिस्ट्री को तेजी से लागू करने का सुझाव दिया गया है।
ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में हेल्थकेयर पहुंच बढ़ाने पर जोर
समिति ने शहरों के बाहर स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार करने की जरूरत पर भी जोर दिया। इसके लिए मोबाइल डायग्नोस्टिक यूनिट, जिलों में हब-एंड-स्पोक टेलीहेल्थ सेवाएं और दूरदराज के इलाकों में दवाओं व डायग्नोस्टिक सैंपल की आवाजाही के लिए पोस्टल नेटवर्क का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट में भारत में अस्पताल बेड की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसके मुताबिक देश में प्रति 1,000 आबादी पर करीब 1.3 अस्पताल बेड हैं, जबकि WHO का मानक 3.5 बेड का है। सरकारी क्षेत्र में यह आंकड़ा करीब 0.79 बेड प्रति 1,000 आबादी बताया गया है। संसदीय समिति की सिफारिशें लागू होने पर प्राइवेट अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ सकती है और मरीजों को इलाज शुरू होने से पहले संभावित खर्च की स्पष्ट जानकारी मिल सकती है।