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पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे तीनों आरोप साबित, जांच समिति की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा पर लगे तीनों आरोप साबित, जांच समिति की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली: पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से जुड़ा कैश कांड एक बार फिर सुर्खियों में है। दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में जले हुए करेंसी नोट मिलने के मामले में जांच समिति ने उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना है। रिपोर्ट में नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत की संतोषजनक जानकारी नहीं दिए जाने और महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में कथित चूक जैसे पहलुओं पर गंभीर टिप्पणियां की गई हैं।

समिति ने हालांकि यह निष्कर्ष नहीं निकाला कि स्टोररूम में मिली पूरी नकदी सीधे जस्टिस वर्मा की व्यक्तिगत संपत्ति थी। रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि उनके सरकारी आवास के स्टोररूम में मौजूद इतनी बड़ी और अस्पष्टीकृत नकदी को लेकर वह संतोषजनक जवाब नहीं दे सके।

स्टोररूम में मिले थे बड़ी संख्या में ₹500 के नोट

जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के मुताबिक, स्टोररूम में सिर्फ कुछ जले हुए नोट नहीं मिले थे। वहां ₹500 के नोटों की गड्डियां और बड़ी मात्रा में नकदी मौजूद होने की बात सामने आई थी।

आग लगने के बाद मौके पर पहुंचे अधिकारियों और अन्य लोगों ने कथित तौर पर आधे जले नोटों को देखा था। मामले की जांच में प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के साथ-साथ तस्वीरों और वीडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को भी महत्व दिया गया।

हालांकि, बरामद नकदी को तत्काल सुरक्षित करके जब्त नहीं किया गया और न ही उसकी विस्तृत सूची तैयार हुई। इसी वजह से स्टोररूम में मौजूद कुल रकम की सटीक राशि निर्धारित नहीं की जा सकी।

नकदी कहां से आई? नहीं मिला संतोषजनक जवाब

समिति के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी आखिर पहुंची कैसे।

रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा से रकम के स्रोत और उसके मालिकाना हक को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया था। लेकिन समिति को उनके जवाबों से नकदी की मौजूदगी की विश्वसनीय और संतोषजनक व्याख्या नहीं मिली।

हालांकि, जांच समिति ने यह नहीं कहा कि बरामद प्रत्येक नोट का व्यक्तिगत मालिक जस्टिस वर्मा ही थे। समिति का जोर इस बात पर रहा कि उनके नियंत्रण वाले सरकारी आवास में मौजूद इतनी बड़ी और अस्पष्टीकृत रकम के बारे में वह पर्याप्त सफाई नहीं दे सके।

आग के बाद सबूत सुरक्षित रखने पर भी गंभीर सवाल

मामले में दूसरा बड़ा पहलू साक्ष्यों के संरक्षण से जुड़ा रहा। जांच के दौरान स्टोररूम की स्थिति को लेकर समिति ने कई सवाल उठाए।

रिपोर्ट के मुताबिक, आग बुझने के बाद स्टोररूम को तत्काल सील नहीं किया गया। वहां मौजूद जले हुए सामान और मलबे को हटाए जाने की बात भी सामने आई। इसके अलावा नकदी को तत्काल जब्त करके उसकी इन्वेंटरी तैयार नहीं की गई।

बाद में स्टोररूम की सफाई किए जाने से वहां पहले मौजूद कुछ महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध नहीं रहे। समिति ने माना कि महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।

आधी जली नकदी हटाए जाने की भी जांच

पहले सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित इन-हाउस कमेटी की जांच में भी इस पहलू पर ध्यान दिया गया था। रिपोर्ट में घरेलू स्टाफ से जुड़े दो लोगों द्वारा आग बुझाने वाले कर्मचारियों और पुलिस के वहां से चले जाने के बाद स्टोररूम से आधी जली नकदी हटाने की भूमिका का उल्लेख किया गया था।समिति ने प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और परिस्थितिजन्य तथ्यों को मिलाकर इस पहलू पर अपने निष्कर्ष दर्ज किए।

'फंसाने के लिए कैश रखा गया' दावे को नहीं माना पर्याप्त

जस्टिस यशवंत वर्मा ने नकदी से किसी तरह का संबंध होने से इनकार किया था। उन्होंने यह संभावना भी जताई थी कि उन्हें बदनाम या फंसाने के उद्देश्य से किसी ने स्टोररूम में नकदी रखी हो सकती है।

लेकिन जांच समिति को इस दावे के समर्थन में पर्याप्त ठोस साक्ष्य नहीं मिले। समिति ने स्टोररूम तक पहुंच और वहां की सुरक्षा व्यवस्था समेत विभिन्न परिस्थितियों का परीक्षण किया और साजिश के दावे को स्वीकार नहीं किया।

जांच में 55 गवाहों के बयान हुए दर्ज

कैश कांड सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 22 मार्च 2025 को तीन सदस्यीय इन-हाउस कमेटी गठित की थी। इस समिति ने मामले की पड़ताल के दौरान 55 गवाहों के बयान दर्ज किए। इसके अलावा स्टोररूम का निरीक्षण कर उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच की गई। मामला आगे बढ़ने के बाद संसदीय प्रक्रिया के तहत भी जांच की गई।

लोकसभा अध्यक्ष ने बनाई थी तीन सदस्यीय समिति

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की थी।

इस पैनल में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार, बॉम्बे हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे।

समिति ने अपनी रिपोर्ट 18 मई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। रिपोर्ट को नियमों के अनुसार संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखने की प्रक्रिया तय की गई थी।

9 अप्रैल 2026 को दे चुके हैं इस्तीफा

जस्टिस यशवंत वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे के बाद उन्हें पद से हटाने की संसदीय प्रक्रिया की स्थिति बदल गई, लेकिन जांच रिपोर्ट और उससे जुड़े संवैधानिक सवाल अपनी जगह बने रहे। अब रिपोर्ट सामने आने के बाद न्यायपालिका में जवाबदेही, सरकारी आवास में मिली नकदी, साक्ष्यों के संरक्षण और संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की जिम्मेदारी को लेकर चर्चा फिर तेज होने की संभावना है।


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