बलौदा बाजार। हरिभूमि–आईएनएच की ओर से चलाए जा रहे जिला संवाद कार्यक्रम के तहत इस बार बलौदा बाजार में जिले के विकास, समस्याओं और संभावनाओं पर खुलकर चर्चा हुई। कार्यक्रम में आईएनएच हरिभूमि के नेशनल ब्यूरो हेड शैलेश पांडेय ने जिले के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े लोगों से सीधा संवाद किया। इस दौरान राइस मिलिंग, शिक्षा, कॉलोनाइजेशन, किसानों की समस्याएं, धान खरीदी व्यवस्था, युवाओं में बढ़ते भटकाव, स्कूलों की स्थिति और जिले में उच्च शिक्षा संस्थानों की जरूरत जैसे कई अहम मुद्दे सामने आए।
संवाद में राइस मिलर संजू पटेल, कॉलोनाइजर नरेश भट्टा, शिक्षाविद् एवं प्रिंसिपल संजय पांडेय और कृषक महेंद्र वर्मा ने अपने-अपने क्षेत्र की समस्याएं और अपेक्षाएं विस्तार से रखीं। चर्चा में यह बात उभरकर सामने आई कि जिले में कुछ व्यवस्थाएं जरूर सुधरी हैं, लेकिन अब भी कई क्षेत्रों में बड़े सुधार की जरूरत बनी हुई है।
राइस मिलरों ने कहा- धान खरीदी में हमारी भूमिका सेतु जैसी, कुछ दिक्कतें अब भी बाकी
जिला संवाद के दौरान नेशनल ब्यूरो हेड शैलेश पांडेय ने सबसे पहले राइस मिलिंग सेक्टर से जुड़े संजू पटेल से सवाल किया कि छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है और धान खरीदी व्यवस्था में राइस मिलरों की भूमिका अहम है, ऐसे में वे मौजूदा व्यवस्था से कितने संतुष्ट हैं।
इस पर संजू पटेल ने कहा कि सरकार की धान खरीदी योजना किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक है और राइस मिल इसमें एक सेतु की भूमिका निभाता है। उन्होंने माना कि राइस मिलिंग सेक्टर में कुछ दिक्कतें जरूर हैं, लेकिन सरकार के साथ लगातार बैठकों और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने बताया कि पहले कुछ मांगों को लेकर उठाव और कस्टम मिलिंग को लेकर नाराजगी थी, लेकिन सरकार ने बाद में कुछ मांगें मान लीं, जिसके बाद काम सामान्य रूप से फिर शुरू हुआ।
पटेल ने यह भी कहा कि अभी राइस मिलर्स पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं, मगर सरकार की ओर से सकारात्मक रुख मिला है और बातचीत के जरिए लंबित मुद्दों के हल की उम्मीद है।
बलौदा बाजार में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज की जरूरत महसूस की गई
कार्यक्रम में शैलेश पांडेय ने शिक्षा के मुद्दे पर प्रिंसिपल संजय पांडेय से पूछा कि प्रदेश के कई दूरस्थ जिलों में मेडिकल कॉलेज खुल चुके हैं, लेकिन बलौदा बाजार अब भी मेडिकल कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज जैसी संस्थाओं से वंचित है। इस पर संजय पांडेय ने कहा कि अच्छी शिक्षा ही अच्छे समाज और मजबूत देश की नींव होती है।
उन्होंने कहा कि जब जिला बना था, तब लोगों को काफी उम्मीदें थीं। आज भी यहां मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज और केंद्रीय विद्यालय जैसी संस्थाओं की जरूरत महसूस की जा रही है, ताकि बच्चों को बेहतर शिक्षा और जिले को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि जिले में कुछ अच्छे काम भी हुए हैं। उन्होंने जिला लाइब्रेरी और अर्थशाला जैसे प्रयासों की सराहना की और कहा कि ऐसे प्रयोग बच्चों को बेहतर एक्सपोजर देने में मददगार हैं।
स्कूलों में तकनीकी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी बड़ा मुद्दा
शिक्षा व्यवस्था की गहराई से चर्चा करते हुए संजय पांडेय ने कहा कि जिले में अलग-अलग तरह के स्कूल हैं—सरकारी प्राथमिक स्कूल, मिडिल स्कूल, आत्मानंद स्कूल और डीएवी मुख्यमंत्री पब्लिक स्कूल। लेकिन इन सबके बीच तकनीकी सुविधाओं, बुनियादी ढांचे और शिक्षकों की उपलब्धता में बड़ा अंतर है।
उन्होंने कहा कि यदि नई शिक्षा नीति 2020 को जमीन पर सही ढंग से लागू करना है, तो सभी स्कूलों में एक समान गुणवत्ता और संसाधन सुनिश्चित करने होंगे। उनका कहना था कि सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ते हैं, इसलिए सुधार की असली जरूरत बुनियादी स्तर पर है।
संजय पांडेय ने आत्मानंद स्कूलों को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आत्मानंद स्कूलों का कॉन्सेप्ट अच्छा था और वहां अच्छे शिक्षकों की भर्ती भी हुई। वहीं डीएवी मुख्यमंत्री स्कूलों का विचार भी ठीक है, लेकिन इन संस्थानों को और सहयोग की जरूरत है। उन्होंने कहा कि बच्चा कहीं भी पढ़े, वह देश का बच्चा है, इसलिए सरकार के साथ-साथ समाजसेवी संस्थाओं को भी शिक्षा क्षेत्र में योगदान देना चाहिए।
युवाओं में बढ़ते भटकाव और डिप्रेशन पर जताई चिंता
चर्चा के दौरान जब युवाओं में बढ़ती आत्महत्या, डिप्रेशन और भटकाव की घटनाओं का मुद्दा उठा, तब संजय पांडेय ने इसे गंभीर सामाजिक चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि युवाओं में संस्कार, अनुशासन, धैर्य और परिवार के साथ संवाद की कमी महसूस की जा रही है।
उन्होंने कहा कि आजकल बच्चे और युवा मोबाइल, रील्स और ज्यादा स्क्रीन टाइम में उलझते जा रहे हैं, जिससे उनका ध्यान और एकाग्रता प्रभावित हो रही है। उन्होंने माना कि बच्चों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं, बल्कि काउंसलिंग, करियर गाइडेंस और भावनात्मक सहारा भी जरूरी है। संजय पांडेय ने कहा कि बच्चों को यह समझाना होगा कि जीवन में हमेशा सफलता नहीं मिलती, हार के लिए भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए।
कॉलोनाइजर बोले- पीएम आवास से लाभ जरूर, लेकिन बाजार का स्वरूप अलग
आवास और कॉलोनी विकास को लेकर शैलेश पांडेय ने कॉलोनाइजर नरेश भट्टा से सवाल किया कि प्रधानमंत्री आवास योजना आने के बाद कॉलोनी व्यवसाय के स्वरूप में कोई बदलाव आया है या नहीं।
इस पर नरेश भट्टा ने कहा कि पीएम आवास योजना से निश्चित रूप से पात्र लोगों को लाभ मिला है, लेकिन निजी कॉलोनाइजेशन की प्रकृति अलग है और उसका बाजार अभी भी अपनी शर्तों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों की खरीद क्षमता बढ़ी है, रहन-सहन का स्तर बदला है और जिले में आर्थिक गतिविधियां भी पहले की तुलना में बढ़ी हैं।
किसानों ने कहा- व्यवस्थाएं कुछ सुधरीं, लेकिन संतोष अब भी नहीं
कार्यक्रम में सबसे अहम चर्चा किसानों की समस्याओं पर हुई। शैलेश पांडेय ने कृषक महेंद्र वर्मा से पूछा कि बीते दो वर्षों में किसानों की स्थिति और धान खरीदी व्यवस्था में कितना सुधार आया है।
इस पर महेंद्र वर्मा ने साफ कहा कि व्यवस्थाएं कुछ हद तक सुधरी हैं, लेकिन किसान अभी भी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि कई व्यवस्थाओं में सुधार की बहुत जरूरत है। खासतौर पर किसानों को शहर में ट्रैक्टर लेकर आने-जाने, सामान सप्लाई करने और प्रशासनिक नियमों के कारण काफी परेशानी होती है।
उन्होंने कहा कि ट्रैक्टर किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका का साधन है, लेकिन शहर में प्रवेश करने पर चालान और रोक-टोक जैसी दिक्कतें सामने आती हैं। इससे छोटे किसानों की कमाई और कामकाज दोनों प्रभावित होते हैं।
धान खरीदी, पंजीयन और टोकन व्यवस्था पर किसानों की नाराजगी
महेंद्र वर्मा ने धान खरीदी व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि इस साल किसानों को धान बेचने में काफी परेशानी हुई। पंजीयन प्रणाली, तकनीकी खामियां और टोकन व्यवस्था किसानों के लिए बड़ी समस्या बनकर सामने आई।
उन्होंने बताया कि जिन किसानों की जमीन अलग-अलग जगहों पर है, उन्हें पंजीयन कराने में खासा संघर्ष करना पड़ा। कई मामलों में एक जगह पंजीयन हो गया, लेकिन दूसरी जगह नहीं हो सका। इससे किसानों को उपज बेचने में दिक्कत हुई।
उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ समर्थन मूल्य बढ़ा देने से ही किसान की सभी समस्याएं हल नहीं हो जातीं। किसानों को अन्य बुनियादी सुविधाएं, प्रक्रिया में सरलता और प्रशासनिक सहयोग भी चाहिए। महेंद्र वर्मा ने यह मांग भी रखी कि कृषि उपकरणों पर मिलने वाली सब्सिडी और योजनाओं का लाभ सभी क्षेत्रों में समान रूप से मिलना चाहिए।
राइस मिलर और किसान के बीच तालमेल पर भी हुई चर्चा
संवाद के दौरान यह सवाल भी उठा कि क्या राइस मिलर किसानों को पर्याप्त सहयोग दे रहे हैं। इस पर महेंद्र वर्मा ने कहा कि सहयोग मिलता है, लेकिन व्यवस्था में अभी भी कई ऐसी कमियां हैं जिनका असर सीधे किसान पर पड़ता है। वहीं संजू पटेल ने भी कहा कि कई बार समस्या राइस मिलर या किसान के स्तर पर नहीं, बल्कि नीतियों और समय पर निर्णय नहीं होने के कारण पैदा होती है।
उन्होंने कहा कि यदि नीतियां समय पर बनें और क्रियान्वयन में देरी न हो, तो धान के निराकरण और उठाव से जुड़ी कई परेशानियां खुद-ब-खुद कम हो सकती हैं।