जगदलपुर। बस्तर दशहरा के ऐतिहासिक समापन समारोह में पनिका-पनका समाज ने अपने संवैधानिक अधिकारों का मुद्दा उठाया। जगदलपुर में आयोजित मुरिया दरबार के दौरान समाज के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पांच पृष्ठों का आवेदन सौंपकर समुदाय को दोबारा अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में शामिल करने की मांग की। समाज की महिला प्रतिनिधि वंदना दास ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और समुदाय की मौजूदा परिस्थितियों का हवाला देते हुए राष्ट्रपति के समक्ष अपनी बात रखी।
समाज की इस पहल से पनिका-पनका समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दोबारा दिलाने का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि समुदाय के पुराने दर्जे और उससे जुड़े दस्तावेजों पर विचार करते हुए उचित कदम उठाए जाएं।
बस्तर दशहरा के मुरिया दरबार में पहुंचा समाज का मुद्दा
बस्तर के विश्वप्रसिद्ध 75 दिवसीय दशहरा महोत्सव का समापन मुरिया दरबार के आयोजन के साथ हुआ। जगदलपुर के सिरहासार भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं।
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने जनजातीय समुदायों के बीच एकता बनाए रखने और बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने पर जोर दिया। इसी आयोजन के दौरान पनिका-पनका जाति राष्ट्रीय महासमिति की ओर से समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में दोबारा शामिल करने का विषय उठाया गया।
समाज की प्रतिनिधि वंदना दास ने विशेष अनुमति के माध्यम से राष्ट्रपति के सामने अपनी बात रखी और समुदाय की समस्याओं पर ध्यान देने का आग्रह किया।
वंदना दास ने गरीबी और सामाजिक परेशानियों का किया जिक्र
समाज की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए वंदना दास ने राष्ट्रपति के सामने लगभग तीन मिनट तक समुदाय की स्थिति और उससे जुड़ी समस्याओं को प्रस्तुत किया। उन्होंने समाज में गरीबी, भुखमरी और आर्थिक कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए संवैधानिक अधिकारों की बहाली की मांग की।
प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य समुदाय की मांगों को सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचाना और ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर मामले पर पुनर्विचार कराना था।
पांच पृष्ठों के आवेदन में 1960 और 1971 की अधिसूचनाओं का उल्लेख
पनिका-पनका समाज की ओर से राष्ट्रपति को सौंपे गए आवेदन में समुदाय के पुराने अनुसूचित जनजाति दर्जे के समर्थन में ऐतिहासिक अधिसूचनाओं का हवाला दिया गया है।
समाज के अनुसार, आवेदन में 15 नवंबर 1960 को तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार की ओर से जारी अधिसूचना का उल्लेख है। प्रतिनिधिमंडल का दावा है कि इसमें क्रमांक 39 पर पनिका समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।
इसके अलावा, आवेदन में 8 दिसंबर 1971 की अधिसूचना का भी जिक्र किया गया है। समाज का कहना है कि बाद में लगाए गए क्षेत्रीय प्रतिबंधों के कारण छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में समुदाय के लोगों को अनुसूचित जनजाति से जुड़े लाभ नहीं मिल पाए।
इन्हीं दस्तावेजों को आधार बनाते हुए प्रतिनिधिमंडल ने समुदाय की स्थिति पर पुनर्विचार करने और अनुसूचित जनजाति की सूची में दोबारा शामिल करने की मांग रखी है। इन दावों और अधिसूचनाओं की कानूनी स्थिति की पुष्टि संबंधित सरकारी अभिलेखों से की जानी आवश्यक है।
राष्ट्रपति के समक्ष रखी गई मांगों पर कार्रवाई की उम्मीद
समाज की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रतिनिधिमंडल की बात संवेदनशीलता के साथ सुनी। समाज का दावा है कि इस विषय पर त्वरित कार्रवाई का भरोसा भी मिला है।
इससे समुदाय के सदस्यों में अपनी मांगों को लेकर उम्मीद बढ़ी है। हालांकि, पनिका-पनका समाज को अनुसूचित जनजाति की सूची में दोबारा शामिल करने के संबंध में किसी औपचारिक सरकारी निर्णय की जानकारी सामने नहीं आई है।
समाज की महिला प्रतिनिधियों ने भी रखी भागीदारी
राष्ट्रपति को आवेदन सौंपने के दौरान वंदना दास के साथ मालती दास, कमला दास, लक्ष्मी दास और सरस्वती दास भी मौजूद रहीं। प्रतिनिधिमंडल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों और समुदाय की समस्याओं के आधार पर मांग पर विचार करने का आग्रह किया।
समाज की महिला प्रतिनिधियों की इस भागीदारी को समुदाय की मांगों को सामने रखने की एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
मुरिया दरबार में शामिल हुए प्रदेश के कई प्रमुख नेता
बस्तर दशहरा के समापन अवसर पर आयोजित मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमन डेका, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, बस्तर के सांसद महेश कश्यप, जगदलपुर के विधायक एवं भाजपा प्रदेश अध्यक्ष किरण सिंहदेव और संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
इस ऐतिहासिक आयोजन में जहां बस्तर की सांस्कृतिक परंपराओं और जनजातीय एकता पर जोर दिया गया, वहीं पनिका-पनका समाज की मांग ने अनुसूचित जनजाति के दर्जे और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े सवाल को भी प्रमुखता से सामने ला दिया। अब समुदाय की नजर इस मांग पर आगे होने वाली आधिकारिक कार्रवाई पर है।