Nagda Forest: नागदा में वन विभाग का कागजी जंगल! 20 लाख फूंककर लगाए 10 हजार पौधे 

Nagda Forest: पर्यावरण संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के नाम पर सरकारी खजाने से लाखों रुपये पानी की तरह बहाने वाले वन विभाग की एक बड़ी लापरवाही और विसंगति धरातल पर उजागर हुई है। उज्जैन जिले के नागदा अंचल के अंतर्गत वन विभाग के दावों और मैदानी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिल रहा है। कागजों पर जहां 10 हजार पौधे लगाकर वन खड़ा करने का दावा किया जा रहा है, वहीं ग्राउंड जीरो पर आधी से अधिक जमीन बंजर और कंटीली झाड़ियों से पटी पड़ी है। इस घपलेबाजी के बीच अब वन विभाग आगामी वित्तीय वर्ष के तहत एक नए पथरीले इलाके में फिर से लाखों रुपये खर्च कर नया पौधारोपण करने के फेर में जुट गया है।

करोड़ों की जमीन पर झाड़ियों का राज

वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान वन विभाग ने ग्राम बेड़ावन्या के मगरे पर लगभग 19.5  हेक्टेयर (करीब 700 बीघा) सरकारी जमीन को चिंहित कर मेगा प्लांटेशन ड्राइव चलाई थी। रिकॉर्ड के मुताबिक यहां 10 हजार पौधे रोपे गए थे। जब मीडिया टीम ने बेड़ावन्या वन क्षेत्र का मुआयना किया, तो मुख्य गेट के पास कुछ पौधे जीवित मिले। मौके पर तैनात 2-3 चौकीदारों ने बताया कि पौधों को टैंकरों के जरिए सींचा जाता है। बिजली गुल होने से दो दिन काम बंद था, जो अब ट्यूबवेल चालू होने के बाद दोबारा शुरू किया गया है।

सच्चाई आई सामने 

जब टीम ने सुरक्षा घेरे के अंदर सुदूर इलाकों और चारों कोनों पर जाकर पड़ताल की, तो चौकीदारों के 'बांस के पौधे' वाले दावे हवा हो गए। गेट से कुछ दूरी पर पौधों का नामोनिशान नहीं था; वहां सिर्फ प्राकृतिक रूप से उगी झाड़ियां और सूखी जमीन नजर आई।

एक प्रोजेक्ट पर आता है 15 से 20 लाख का खर्च

विभागीय सूत्रों के अनुसार, किसी भी बंजर या पथरीली जमीन पर वन विकसित करने की प्रक्रिया बेहद खर्चीली होती है। सबसे पहले पूरे क्षेत्र की कटीले तारों से फेंसिंग (घेराबंदी) की जाती है। इसके बाद जेसीबी या क्रेन से गड्ढे खोदे जाते हैं। पथरीली जमीन होने के कारण उन गड्ढों में बाहर से लाकर उर्वरक युक्त काली मिट्टी भरी जाती है। इसके बाद ही पौधा रोपा जाता है और उनकी सुरक्षा के लिए बकायदा वेतनभोगी चौकीदार रखे जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में प्रति प्रोजेक्ट 15 से 20 लाख रुपए का सरकारी बजट ठिकाने लगाया जाता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि इतनी भारी-भरकम राशि और स्टाफ की तैनाती के बावजूद बेड़ावन्या में 50% से अधिक पौधे गायब क्यों हैं? क्या वाकई धरातल पर पौधे लगाए ही नहीं गए या फिर अफसरों की लापरवाही और पानी के अभाव में वे सूखकर नष्ट हो गए?

अब 20 हेक्टेयर उजाड़ने की तैयारी!

बेड़ावन्या के इस कड़वे सच के बावजूद वन विभाग ने अपनी कमियों को सुधारने के बजाय वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए एक नया शिकार ढूंढ लिया है। अब रानी पिपल्या रोड पर स्थित गौशाला के समीप 20 हेक्टेयर की पथरीली जमीन पर नया जंगल बनाने का खाका खींचा गया है। यहां भी कटीले तारों की फेंसिंग का ठेका पूरा हो चुका है और हजारों गड्ढे खोदकर रख दिए गए हैं। विभाग को अब सिर्फ पहली बारिश का इंतजार है ताकि नया बजट खपाया जा सके। गौरतलब है कि यह पूरा इलाका पथरीला है और यहाँ अक्सर हिंसक वन्यजीवों की आवाजाही बनी रहती है, जिससे नए पौधों के बचने की उम्मीद वैसे भी कम है।

जिम्मेदारों की बोलती बंद

इस पूरे कथित गड़बड़झाले को लेकर जब मैदानी स्तर पर जवाबदेह डिप्टी रेंजर रजनी से संपर्क किया गया, तो उनका जवाब बेहद गैर-जिम्मेदाराना था। उन्होंने कहा, "मैं इस विषय में कोई जानकारी नहीं दे सकती। मुझे कुछ नहीं पता, जो भी जानकारी चाहिए वह स्थानीय वनरक्षक (बीट गार्ड) से ही मिलेगी।" एक तरफ डिप्टी रेंजर को अपने ही प्रभार वाले क्षेत्र की सरकारी योजना की एबीसीडी नहीं मालूम, तो दूसरी तरफ मामले की गंभीरता को लेकर जब जिले के डीएफओ (DFO) अनुराग तिवारी को फोन लगाया गया, तो उन्होंने भी कॉल अटेंड करना मुनासिब नहीं समझा। अफसरों का यह रवैया साफ दर्शाता है कि नागदा वन परिक्षेत्र में 'हरियाली' के नाम पर चल रहे इस खेल की जड़ें कितनी गहरी हैं।

Publisher: INH 24x7