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CJP Protest: सुप्रीम कोर्ट सख्त, मेट्रो सेवाओं और आम लोगों की आवाजाही पर दिए अहम निर्देश

CJP Protest: सुप्रीम कोर्ट सख्त, मेट्रो सेवाओं और आम लोगों की आवाजाही पर दिए अहम निर्देश

दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन और नेताओं को एहतियातन हिरासत में लिए जाने से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने लोगों की सामान्य आवाजाही सुनिश्चित करने, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कानून के अनुरूप कार्रवाई करने और प्रभावित इलाकों में मेट्रो सेवाओं को सामान्य बनाने से जुड़े निर्देश दिए हैं। मामले में पहले दिए गए आदेशों के कथित उल्लंघन को लेकर केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों से भी जवाब मांगा गया है। इस घटनाक्रम के बीच CJP नेता अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत से रिहा कर दिया गया। तीनों ने शांति और अच्छे व्यवहार से जुड़े मुचलके की शर्तें स्वीकार कीं। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से मांगा जवाब

प्रदर्शन के दौरान की गई पुलिस कार्रवाई और मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की विशेष पीठ ने सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि 9 अक्टूबर को जारी अदालत के निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इन आरोपों पर संज्ञान लेते हुए अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को अवमानना संबंधी नोटिस जारी कर मंगलवार तक जवाब देने को कहा। अधिकारियों से यह बताने को कहा गया है कि कथित तौर पर आदेशों का पालन नहीं करने के मामले में उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न की जाए। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। उनका कहना था कि बैरिकेडिंग और आवाजाही से जुड़ी पाबंदियों के कारण आम नागरिकों को परेशानी हो रही है। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में आवागमन सामान्य करने और मेट्रो सेवाएं बहाल करने की मांग भी उठाई।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन और नागरिकों की आवाजाही पर जोर

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि लोगों की सामान्य आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को हिरासत में नहीं लिया जा सकता। प्रदर्शन से संबंधित प्रतिबंधित क्षेत्रों के बाहर शांतिपूर्ण और बिना हथियार के प्रदर्शन करने वाले लोगों के अधिकारों को लेकर भी अदालत के निर्देश महत्वपूर्ण हैं। इस मामले में पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई की वैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं। अदालत परिसर और उसके आसपास भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत प्रतिबंध लागू होने की सूचना देने वाले बोर्ड या नोटिस लगे होने के मुद्दे पर भी निर्देश दिए गए। अदालत ने कहा कि ऐसे नोटिसों के कारण न्यायालय आने-जाने वाले लोगों में अनावश्यक भय या भ्रम नहीं होना चाहिए। संबंधित अधिकारियों को ऐसे बोर्ड हटाने के निर्देश दिए गए हैं, जहां वे लागू निर्देशों के विपरीत लगे हों।

अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को किस शर्त पर मिली रिहाई?

दिल्ली में हिरासत में लिए गए CJP नेताओं अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को करीब 23 घंटे बाद रिहा कर दिया गया। उपलब्ध विवरण के मुताबिक, तीनों को 11 अक्टूबर की सुबह दिल्ली कैंट क्षेत्र में संबंधित न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद रिहाई मिली। पुलिस के अनुसार, तीनों नेताओं को BNSS की धारा 126 और 170 के तहत एहतियातन हिरासत में लिया गया था। इसके बाद उन्हें संबंधित अदालत के समक्ष पेश किया गया। रिहाई के लिए तीनों ने एक वर्ष तक शांति बनाए रखने और अच्छे व्यवहार से जुड़े ₹50 हजार के जमानती मुचलके भरे। मुचलके की शर्तों का उल्लंघन होने पर नियमानुसार कार्रवाई हो सकती है। हालांकि, इन शर्तों का अर्थ अपने आप में यह नहीं है कि वे पूरे एक वर्ष तक प्रदर्शन नहीं कर सकते।

दो याचिकाओं के जरिए उठाया गया पुलिस कार्रवाई का मुद्दा

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो याचिकाएं रखी गईं। पहली याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर की गई। इसमें 9 अक्टूबर के आदेश के कथित उल्लंघन को लेकर केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार और DMRC चेयरपर्सन डी. थारा के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई। दूसरी याचिका अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद मेनका गुरुस्वामी की ओर से दायर की गई। इसमें विपक्षी नेताओं को एहतियातन हिरासत में लेने की कार्रवाई को चुनौती दी गई। याचिका में तर्क दिया गया कि एहतियातन हिरासत की व्यवस्था का इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शन के मौलिक अधिकार को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

सुनवाई में कौन-कौन रहा मौजूद?

मामले की सुनवाई जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ के समक्ष हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा। वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े और शादान फररासत समेत वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलीलें पेश कीं। अब मामले में अधिकारियों के जवाब और अदालत के आगे के निर्देशों पर नजर रहेगी। मेट्रो सेवाओं, इंटरनेट बहाली, पुलिस कार्रवाई और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से जुड़े मुद्दे इस प्रकरण के प्रमुख पहलू बने हुए हैं।

 


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