वैश्विक तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते के बाद रूस के तेल निर्यात पर दबाव बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय डेटा एजेंसियों और ट्रेडर्स के मुताबिक, भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद घटाने से रूस को भरोसेमंद ग्राहकों की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
हिंद महासागर में भटक रहे रूसी टैंकर:
रिपोर्ट्स के अनुसार, रूसी तेल से भरे कई टैंकर हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी वास्तविक मंजिल छिपाते हुए दिखाई दे रहे हैं। ये जहाज अंतिम डेस्टिनेशन के तौर पर सिंगापुर का नाम दर्ज कर रहे हैं, जबकि सिंगापुर सीधे तौर पर रूसी तेल का आयात नहीं करता। माना जा रहा है कि इस रणनीति का इस्तेमाल असली खरीदारों की पहचान छिपाने के लिए किया जा रहा है।शिपिंग डेटा बताता है कि हाल के महीनों में बड़ी मात्रा में रूसी कच्चा तेल लेकर जहाज सिंगापुर की ओर रवाना हुए, जो सामान्य व्यापारिक पैटर्न से अलग है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कार्गो का वास्तविक गंतव्य चीन या अन्य एशियाई बाजार हो सकते हैं।
खरीदार छिपाने के लिए ‘प्लेसहोल्डर’ डेस्टिनेशन का खेल:
ट्रेडर्स के अनुसार, सिंगापुर के आसपास समुद्री क्षेत्रों में शिप-टू-शिप ट्रांसफर या फ्लोटिंग स्टोरेज के जरिए तेल की अदला-बदली की जाती है। इसके बाद कार्गो को मलेशिया या अन्य स्थानों पर भेज दिया जाता है। इसी वजह से सिंगापुर, स्वेज या पोर्ट सईद जैसे स्थानों को अक्सर कागजी डेस्टिनेशन के रूप में दिखाया जाता है।
भारत की खरीद घटी, चीन भी सतर्क:
अमेरिका के साथ बढ़ते आर्थिक सहयोग के बीच भारत द्वारा रूस से तेल आयात कम करने की खबरें हैं, हालांकि आधिकारिक स्तर पर भारत ने खरीद बंद करने से इनकार किया है। दूसरी ओर, रूस का सबसे बड़ा खरीदार चीन भी पश्चिमी प्रतिबंधों के जोखिम को देखते हुए स्पॉट खरीद में सावधानी बरत रहा है। इससे रूस के निर्यात विकल्प और सीमित हो रहे हैं।
घटती कमाई से बढ़ी पुतिन की चिंता:
यूक्रेन युद्ध के दौरान तेल-गैस निर्यात रूस की अर्थव्यवस्था का मुख्य सहारा रहा। लेकिन नए प्रतिबंधों, घटती मांग और शिपिंग जोखिमों के कारण राजस्व में गिरावट दर्ज की जा रही है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक, तेल-गैस टैक्स से रूस की सरकारी आय में तेज कमी आई है, जिससे बजट दबाव बढ़ा है। स्थिति ऐसी बन रही है कि सरकार को कर्ज और करों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का असर:
अमेरिका द्वारा रूस की प्रमुख तेल कंपनियों और उनसे जुड़े शिपिंग नेटवर्क पर लगाए गए प्रतिबंधों ने वैश्विक कंपनियों को सतर्क कर दिया है। यदि कोई जहाज प्रतिबंधित रूसी तेल ढोता है, तो उसे अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम से बाहर किया जा सकता है, यही वजह है कि शिपिंग कंपनियां अब जोखिम लेने से बच रही हैं। भारत-अमेरिका नजदीकी, पश्चिमी प्रतिबंध और चीन की सतर्कता—इन तीनों कारकों ने मिलकर रूस के तेल निर्यात पर दबाव बढ़ा दिया है। टैंकरों द्वारा सिंगापुर जैसे फर्जी डेस्टिनेशन दिखाना इस बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक समीकरण का संकेत माना जा रहा है, जिसने मॉस्को की चिंता बढ़ा दी है।