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नाना पाटेकर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार, नम आंखों से दी गई विदाई

नाना पाटेकर का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार, नम आंखों से दी गई विदाई

पुणे/गोवा। हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा स्थित उनके आवास पर तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। उनके निधन की खबर से फिल्म जगत, प्रशंसकों और कला प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, पुणे के डोंजे गांव स्थित उनके फार्महाउस पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

तिरंगे में लिपटा पार्थिव शरीर, राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार

नाना पाटेकर के अंतिम दर्शन के लिए पुणे के डोंजे गांव स्थित उनके फार्महाउस ‘नानाची वाड़ी’ में बड़ी संख्या में प्रशंसक, परिजन और फिल्म जगत से जुड़े लोग पहुंचे। उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर अंतिम विदाई दी गई। इस दौरान पुलिस की ओर से औपचारिक सलामी दी गई और लोगों ने नम आंखों से अपने प्रिय अभिनेता को विदा किया। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अंतिम संस्कार के दौरान ‘नाना अमर रहें’ के नारे गूंजते रहे। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कीं। महाराष्ट्र के कई वरिष्ठ नेताओं और फिल्मी हस्तियों ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

गोवा स्थित आवास पर बिगड़ी थी तबीयत

रिपोर्टों के अनुसार, नाना पाटेकर 8 अक्टूबर की सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर अस्वस्थ हो गए थे। सीने में परेशानी होने के बाद उन्हें चिकित्सा सहायता दी गई और मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने के लिए सीपीआर सहित आपातकालीन प्रयास किए, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की थी। इस घटना के बाद गोवा पुलिस ने अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज कर जांच शुरू की। मौत के सटीक कारण से संबंधित चिकित्सकीय और कानूनी औपचारिकताओं को भी जांच का हिस्सा बनाया गया।

‘गमन’ से शुरू हुआ था फिल्मी सफर

नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उन्होंने 1978 में रिलीज हुई फिल्म ‘गमन’ से हिंदी सिनेमा में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्हें सहायक भूमिकाएं मिलीं, लेकिन अपनी अनोखी संवाद अदायगी, प्रभावशाली आवाज और सहज अभिनय के दम पर उन्होंने दर्शकों के बीच अलग पहचान बनाई। 1986 में आई फिल्म ‘अंकुश’ उनके करियर के लिए अहम साबित हुई। इसके बाद उन्होंने ‘परिंदा’, ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’ और ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का दम दिखाया।

गंभीर अभिनय से कॉमेडी तक, हर किरदार में छोड़ी छाप

नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह अलग-अलग तरह के किरदारों को प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारते थे। गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाओं के साथ उन्होंने हास्य और नकारात्मक किरदारों में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के किरदार ने उन्हें दर्शकों के बीच एक अलग अंदाज में लोकप्रिय बनाया। वहीं ‘अब तक छप्पन’, ‘राजनीति’, ‘भूत’ और ‘शक्ति: द पावर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को सराहना मिली। मराठी सिनेमा में भी उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया और रंगमंच से जुड़ाव बनाए रखा।

तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से हुए सम्मानित

नाना पाटेकर का करियर कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सजा रहा। उन्हें ‘परिंदा’ और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता तथा ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। सिनेमा में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2013 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था। अभिनय के अलावा सामाजिक कार्यों में उनकी भागीदारी भी चर्चा में रही। किसानों की सहायता और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली नाम फाउंडेशन से उनका जुड़ाव उनके सार्वजनिक जीवन का अहम हिस्सा रहा।

पांच दशक का सफर, दर्शकों के दिलों में रहेंगे जिंदा

नाना पाटेकर ने अपने लंबे करियर में हिंदी और मराठी फिल्मों को कई यादगार किरदार दिए। उनकी संवाद अदायगी, अभिनय की तीव्रता और किरदारों में उतर जाने की शैली ने उन्हें दूसरे कलाकारों से अलग पहचान दिलाई। उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसने अलग-अलग भूमिकाओं के जरिए अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। उनकी फिल्में और यादगार संवाद लंबे समय तक दर्शकों के बीच उनकी मौजूदगी का एहसास कराते रहेंगे।


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