बॉम्बे हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना मूल धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार करता है, तो वह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मिलने वाले विशेष संरक्षण का दावा नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति वृषाली वी. जोशी की एकल पीठ ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद संबंधित व्यक्ति की कानूनी स्थिति का आकलन उसी आधार पर किया जाएगा।
पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा था मामला
अदालत के समक्ष आया मामला एक ही परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति विवाद से संबंधित था। वर्ष 2015 में घरेलू विवाद के दौरान महिला ने आरोप लगाया था कि उसके रिश्तेदारों ने मारपीट की और उसकी पूर्व जातिगत पहचान को लेकर अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। इसके आधार पर एससी/एसटी एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कराया गया था।
सुनवाई में धर्म परिवर्तन की पुष्टि
मामले की सुनवाई के दौरान महिला के पति के धर्म परिवर्तन से जुड़े दस्तावेज अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए गए। रिकॉर्ड से सामने आया कि विवाह के समय उन्होंने विधिवत इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और उसके बाद से परिवार मुस्लिम रीति-रिवाजों का पालन कर रहा है। अदालत ने इस तथ्य को निर्णय का महत्वपूर्ण आधार माना।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का लिया गया आधार
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी हवाला दिया गया। अदालत ने माना कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति या जनजाति से जुड़े विशेष संवैधानिक और वैधानिक लाभ स्वतः लागू नहीं रहते। इसी आधार पर आरोपियों को एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों से राहत प्रदान की गई।
अन्य आपराधिक धाराओं में मुकदमा जारी रहेगा
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एससी/एसटी एक्ट से राहत मिलने का अर्थ यह नहीं है कि मामला पूरी तरह समाप्त हो गया है। यदि प्राथमिकी में भारतीय दंड संहिता (या लागू अन्य आपराधिक कानूनों) के तहत दर्ज अन्य आरोप प्रथम दृष्टया बनते हैं, तो उन धाराओं में आरोपियों के खिलाफ विधिक प्रक्रिया और मुकदमा जारी रहेगा।