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सार्थक संवाद : पुलेला गोपीचन्द बोले- अगर प्रतिभा को मौका मिले, तो खुल जाती है सफलता की राह

सार्थक संवाद : पुलेला गोपीचन्द बोले- अगर प्रतिभा को मौका मिले, तो खुल जाती है सफलता की राह

भारत के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी और कोच पुलेला गोपीचंद के नाम से रायपुर में भी बैडमिंटन अकादमी खोली गई है। इस संबंध में कोच गोपीचंद का साफ कहना है, यह अकादमी सिर्फ मेरे नाम से नहीं रहेगी, मैं भी यहां लगातार आऊंगा और यहां की प्रतिभाओं को निखारने का काम किया जाएगा। 

वे कहते हैं, शिकायत नहीं संकल्प चाहिए। अगर प्रतिभा को मौका मिले तो सफलता की राह खुल जाती है। सपने बड़े हों, तो सुविधाओं का इंतजार नहीं, रास्ते बनाने पड़ते हैं। प्रस्तुत है, कोच पुलेला गोपीचंद से हरिभूमि-आईएनएच न्यूज के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के सार्थक संवाद के अंश।

बैडमिंटन कोच पुलेला गोपीचंद से हरिभूमि-आईएनएच न्यूज के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी का सार्थक संवाद

उस दौर में आपने रैकेट थामा, जिस समय सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों में कहा जाता था, बेटा पढ़ो, पढ़ोगे तो कुछ बन जाओगे, नहीं तो चप्पलें चटकाओगे, कैसे?
परिवार का सपोर्ट था और हमारे पिता एक बैंक में काम करते थे तो उनका ट्रांसफर होते-होते हम हैदराबाद पहुंचे, करीब 1985 के टाइम पे। तब देश में सभी लोग क्रिकेट खेलना चाह रहे थे, हम भी ऐसे ही थे। थोड़ा-बहुत खेला घर पे, मतलब अपार्टमेंट में और थोड़े विंडोज हमने भी तोड़े तो नेबर्स ने कंप्लेन की, तब माताजी ने बोला कि चलो स्टेडियम लेकर चलते हैं। क्रिकेट में एडमिशन मिला नहीं, और टेनिस के बारे में पैरेंट्स सोचते हैं कि बहुत महंगा खेल है, इसलिए बैडमिंटन ज्वाइन किया, एडमिशन मिल रहा था। उसके बाद पढ़ाई और खेल का जो बैलेंसिंग एक्ट था, वो काफी मुश्किल था।

 

दो चीजें आपसे जाननी थीं, एक तो आपने ये बताया कि आप जब जूनियर नेशनल चैंपियन बने, उस समय बमुश्किल आपकी 17-18 साल की उम्र थी। आपने बताया कि 91 में आपको टाटा स्टील में जॉब मिल गई। एक 17-18 साल का लड़का, नौकरी पा गया, कैसे?

अभी पढ़ाई नहीं, कोई स्किल नहीं, कोई इंटरेस्ट नहीं, अभी जॉब भी नहीं रहेगी तो हम करेंगे क्या जिंदगी में? 18 साल में मैंने ज्वाइन कर लिया। सो, माय मदर एप्लाइड टू एवरी कॉर्पोरेट, कि ये खेलते रह जाएगा या पढ़ाई ठीक से नहीं करेगा तो ये करेगा क्या? सो, आई थिंक क्रेडिट टू माय मदर, उन्होंने ऐसा सोचा कि इसको जॉब करनी है।

० उस समय कोई खिलाड़ी आपके जेहन में रहता था कि मैं ऐसा बनना चाहता हूं या कोई रोल मॉडल था आपका ?
00 मुझे ज्यादा दूर देखने की जरूरत नहीं पड़ी, क्योंकि हमारे स्टेट में मनोज और प्रवीण दो प्लेयर थे, काफी अच्छे थे। अनिरुद्ध और सुनील ज्योति थे, वे भी अच्छे थे। तो मुझे न, दूर कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ी। वी हैड पीपल लाइक, दीपांकर भट्टाचार्य करके एक थे, जॉर्ज थॉमस करके एक केरला के थे, राजीव बग्गा बॉम्बे के थे। ये जो सारे लोग, मेरे जो कंटेंपररीज हैं, उनसे मैंने बहुत सीखा है।

 प्रकाश पादुकोण की आपके जीवन में क्या भूमिका रही है? 
00 अगर प्रकाश सर 1980 में ऑल इंग्लैंड नहीं जीतते ना, तो हमारे माइंड में ऐसा कभी आता भी नहीं था कि हम भी जीत सकते हैं। तो हमें ये है कि एक इंडियन जीता है तो हमारा जो स्किन वाला है, हमारे जैसे ही जो पला-बढ़ा है, खिला है, वो जीत सकता है, हम भी जीत सकते हैं। सो, आई थिंक जस्ट दैट वन पॉइंट ऑफ बिलीव इज समथिंग व्हिच इज ह्यूज। बट ऑल्सो प्रकाश सर, द वे ही हैज कंडक्टेड हिमसेल्फ, द वे ही हैज प्लेड, आई थिंक एंड द स्ट्रेंथ इन हिज गेम, एक्चुअली हेल्प अस, हेल्प मी टू थिंक दैट बॉस सर कर लिया, प्रकाश सर ने किया तो मैं भी कर सकता हूं।

० आपने यह सोच रखा था कि आगे चलकर मुझे कोचिंग करनी है?
00 ऐसा था कि जब मैं हैदराबाद में था तो हर सुबह स्टेडियम जाता हूं वो अभी 5.30 बजे चले गए, वो वॉचमैन आएगा 6 बजे, यार महबूब साहब उनका नाम था, महबूब साहब आएंगे, आएंगे, आएंगे, मतलब देखते रहते, फिर वो जब आएंगे, अंदर जाएंगे तो एक दिन करंट है, एक दिन करंट नहीं है तो वो एक चैलेंज था, अब शटल है, नहीं है, कोच है, नहीं है, प्लेयर है, नहीं है, वो ग्राउंड में चले जाते हैं तो शादी हुई है।

ग्राउंड बंद है, वो स्वीमिंग पूल करने जाना है, स्वीमिंग करनी है तो स्वीमिंग पूल में पानी नहीं है तो और दिवाली, रमजान, क्रिसमस, स्टेडियम बंद है, सैटरडे, संडे बंद है, सो ऐसे है ना, और मैं यूरोप गया खेलने के लिए, मतलब जर्मनी में 3 साल था तो सारी चीजें एक जगह पे हैं, हमको बेसिक स्ट्रक्चर पे काम करने की जरूरत है, हमको सब चीज चाहिए, मतलब प्लेयर बनने के लिए ना, हम एक-एक घंटे ट्रैवल करके जिम के लिए जाएंगे, एक घंटा रनिंग के लिए जाएंगे, एक घंटे खाने-सोचने के लिए तो ऐसा बात नहीं चलेगा, मतलब एक जगह, तो मेरा ऐसा माइंडसेट था कि भाई ऐसा रहने से अच्छा रहता है, ऐसा करके मैं सोचता था। 

और मुझे यह सब करने के चक्कर में ना, मैं ऑल इंग्लैंड जीता 27 की एज पे, तो मेरा माइंड में ये था कि अगर ये सारी हम फैसिलिटीज बच्चों को दें तो मेरे जैसा बंदा कोई होगा, जिसके पास पोटेंशियल होगा तो वो 27 पे नहीं जीतेगा, ऑल इंग्लैंड में भी 20 साल पे जीतेगा। तो उसको सात-आठ साल और मिलेंगे, ताकि और बहुत बढ़‌या खेल सके।

० खिलाड़ी के रूप में खुद से कितने संतुष्ट हैं?
00 जितना मेहनत मैंने किया, उससे ज्यादा मेरे से होता नहीं है। तो मैं बहुत खुश हूं। मैं ऐसा हूं कि एक बार हो गया, हो गया। अभी उसको पीछे पलट के देखने वाला मैं नहीं हूं। बट हां, आपने जो बोला, बात सही है, बट मेरा एक बेसिक अंडरस्टैंडिंग है कि आप दिल से चाहो, आप रास्ता ढूंढोगे। आप कंप्लेंट करोगे तो रुक जाओगे। उस जमाने में जो मिला, वही बहुत था। मतलब, एंड आई एम वेरी हैप्पी विथ दैट। एंड, अगर सब कुछ मुझे मिलता तो शायद उतनी हंगर मेरे में रहती नहीं। 

० ऐसा कोई निराशा का क्षण, जो आपके जेहन में, अभी भी कचोटता हो। ये एक मौका था, जो गोपीचंद को अखरता हो। उस समय में मैं चूक गया, ऐसा है कोई?
00 ऐसा तो नहीं है, बट ओलंपिक्स इज समथिंग, 2000 सिडनी ओलंपिक्स, आई विश आई कड हैव वन दैट्स वन। मैं ज्यादा उसके बारे में सोचता नहीं हूं, बट ठीक है, उसके बदले में मुझे ऑल इंग्लैंड मिला, ठीक है, इट्स नॉट ए बिग प्रॉब्लम। सो, आई एम हैप्पी विथ दैट।

 आपके नेतृत्व में बैडमिंटन में भारत की उपलब्धियां पिछले डेढ़ दशक, दो दशक में जबरदस्त रहीं, पर अभी एशियन गेम्स हुआ तो अतीत में जैसी उपलब्धियां थीं, उसके मुकाबले में इस बार का प्रदर्शन थोड़ा निराश करता है?
 

00 मैं अपने दूसरे नजरिए से देखूं तो सात्विक और चिराग ने जो वर्ल्ड चैंपियंस हैं, उनको हराया एशियन गेम्स में, टीम चैंपियनशिप में। जापान का जो टॉप पेयर है, जो टॉप फाइव पेयर है, उनको हराया इन द टीम चैंपियनशिप । हमारे खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया।

० भारत सरकार ने बड़ी उम्मीदों के साथ प्रशिक्षण के संदर्भ में एक टास्क फोर्स बनाई, जिसका प्रमुख आपको बनाया था, आपने अपनी रिपोर्ट वगैरह भी दी हुई है।
00 अभी सिंपल है कि अगर आपके देश में टैलेंट है, आपका बच्चा टैलेंटेड है तो भाई, कोई कुछ नहीं बोलेगा, ये देश के लिए खेलना है और इसको स्पोर्ट्स स्कूल में डाल दो, और आपको साल में एक हफ्ता आपके साथ रहेगा, बाकी हर दिन वो मेरे साथ ही रहेगा, और आपको सैटरडे इवनिंग एक बार आपको देखने को मिलेगा। ऐसा सिस्टम लगाता है चीन। एंड दैट इज वैरी सक्सेसफुल। नाउ, इज इट पॉसिबल इन अवर कंट्री, इज ए क्वेश्चन मार्क। अगर हमको ऐसा एक्सीलेंस चाहिए तो हमको उतना सैक्रिफाइसेस करने की भी ताकत रहनी चाहिए, एज ए सिस्टम। सो, दैट्स ऑल आई एम सेइंग।

0 हम 2036 में ओलंपिक की मेजबानी चाहते हैं, ओलंपिक करें, दूसरे देश आएं और जीत के चले जाएं या अपने यहां ओलंपिक है तो भाई ठीक-ठाक पदक हम भी जीत पाएं। इस दृष्टि से गोपीचंद क्या सोचते हैं?
00 अभी तो हमने डिसाइड किया है कि ओलंपिक्स हम कर रहे हैं। अब बिड तो कर रहे हैं, मतलब अपने देश, अपनी तरफ से तो मेहनत यही है कि हम करें, बिड भी करें। सो, इसका पोस्ट ओलंपिक्स और प्री-ओलंपिक प्रिपरेशन के ऊपर हमें और ज्यादा ध्यान देना चाहिए। एक खिलाड़ी को आप बनाने के लिए, छह-आठ साल की उम्र में आप स्टार्ट करते हैं तो वो 20 साल का बनता है। 10-12-15 साल लगते हैं।

० रायपुर में गोपीचंद के नाम पर एकेडमी स्थापित हो रही है तो गोपीचंद का नाम ही रहेगा या गोपीचंद भी कभी-कभी दिखा करेंगे?
00 नहीं, ऐसा नहीं है, मैं भी आऊंगा यहां। यहां की प्रतिभाओं को निखारने का काम होगा।


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