Nirmala Sapre: बीना विधायक निर्मला सप्रे की विधानसभा सदस्यता को लेकर छिड़ी कानूनी जंग अब तीखी होती जा रही है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने विधानसभा सचिवालय और सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए अगली सुनवाई 18 जून को तय की है।
कांग्रेस के 'व्हिप' को बनाया ढाल
सुनवाई के दौरान निर्मला सप्रे के अधिवक्ता ने अदालत में एक बड़ा दावा पेश किया। उन्होंने तर्क दिया कि 27 अप्रैल को विधानसभा के विशेष सत्र के दौरान कांग्रेस द्वारा जारी किए गए व्हिप (Whip) का पालन करते हुए निर्मला सप्रे सदन में मौजूद रही थीं। इस आधार पर विधायक की ओर से एक बार फिर यह दोहराया गया कि वे तकनीकी और वैधानिक रूप से अभी भी कांग्रेस पार्टी में ही हैं।
समयसीमा का क्या हुआ?
चीफ जस्टिस संजीव कुमार सचदेवा की बेंच ने सुनवाई के दौरान दलबदल मामलों के निराकरण में होने वाली देरी पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने याद दिलाया कि दलबदल के मामलों में फैसला लेने के लिए 90 दिनों की समयसीमा तय है। अदालत ने सवाल खड़ा किया कि आखिर यह मामला 720 दिनों (करीब दो साल) तक क्यों खिंचता चला गया? हाईकोर्ट ने कहा कि विधानसभा स्पीकर के संज्ञान में सुप्रीम कोर्ट की वह गाइडलाइन लाई जाए, जिसमें समयबद्ध निराकरण की बात कही गई है।
सरकार और सिंघार का पक्ष
राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि विधानसभा स्पीकर इस मामले में विधिवत सुनवाई कर रहे हैं और उमंग सिंघार द्वारा पेश किए गए साक्ष्यों की बारीकी से जांच की जा रही है। नेता प्रतिपक्ष के वकील विभोर खंडेलवाल ने कोर्ट से पुरजोर मांग की कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 90 दिनों की समयसीमा का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराया जाए ताकि लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे। अब सारा दारोमदार विधानसभा सचिवालय की कार्रवाई और 18 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिका है।