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Mahashivratri Special : महाशिवरात्रि दिव्य विमर्श, पार्थिव पूजन और गहन विधान

Mahashivratri Special : महाशिवरात्रि दिव्य विमर्श, पार्थिव पूजन और गहन विधान

Mahashivratri Special : शिवलिंग इस पूरी धरती की सबसे अनूठी, रहस्यमयी और वैज्ञानिक संरचना है। यह एक ऐसा निराकार गोलाकार पिंड है जो अपने सूक्ष्म आकार में संपूर्ण अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक बन जाता है। वास्तव में, यदि हम आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्मता से विचार करें तो यह विशाल प्रकृति ही शिव का साक्षात साकार रूप है और इसका कण-कण में फैला विस्तार ही शिवत्व है। शिव और प्रकृति कोई दो भिन्न सत्ताएँ नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक भी हैं और परस्पर आबद्ध भी हैं। वे ही इस जीवन के आधार हैं, वे ही इसके संचालक हैं और अंततः उन्हीं के भीतर समस्त जीवन का लय होना सुनिश्चित है।

हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में वर्णित शिव का स्वरूप किसी कपोल-कल्पना पर आधारित नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक और तार्किक सूत्रों पर टिका है। जिस प्रकार कंप्यूटर की जटिल कोडिंग को उसका जानकार ही डिकोड कर सकता है, उसी प्रकार शिव के प्रतीकों को डिकोड करने पर हमें 'पंच महाभूतों' का विराट विज्ञान समझ आता है। शिव के साथ रहने वाले 'भूत' वास्तव में वे पांच तत्व हैं जिनसे यह ब्रह्मांड निर्मित हुआ है, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। उनके शीश पर विराजमान चंद्रमा अनंत आकाश तत्व का द्योतक है, जटाओं से प्रवाहित गंगा साक्षात जल तत्व है, उनका तीसरा नेत्र ऊर्जा और अग्नि तत्व का पुंज है, वायु तत्व उनके 'दिगंबर' स्वरूप में सर्वत्र व्याप्त है और नंदी स्थिरता के प्रतीक पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

स्तुति का दार्शनिक भाव और शिव परिवार का सामंजस्य

प्रसिद्ध स्तुति 'कर्पूरगौरं करूणावतारं' का गूढ़ अर्थ भी यही है कि यह समूची सृष्टि सूर्य के प्रकाश में कपूर के समान गौर वर्ण दिखाई देती है और इन पंच तत्वों की करुणा से ही समस्त जीवों का अस्तित्व बना हुआ है। जब तक ये तत्व हमारे भीतर संतुलित हैं, हमारा हृदय धड़कता है; इनके असंतुलित होते ही हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाता है। शिवजी का परिवार और उनके साथ रहने वाले जीव हमें अत्यंत विषम परिस्थितियों और परस्पर विरोधी स्वभावों के बीच भी सामंजस्य और परम शांति बनाए रखने का अद्भुत दिव्य संदेश देते हैं। उनके स्वरूप में एक ओर चंद्रमा की अमृतमयी शीतलता है, तो दूसरी ओर उनके गले में लिपटे नाग का घातक विष है; एक ओर गंगा की धारा है, तो ठीक उसके नीचे अग्नि रूपी तीसरा नेत्र है।

उनके वाहनों के बीच भी नैसर्गिक शत्रुता का भाव है, माता पार्वती का वाहन सिंह है तो शिव का नंदी (बैल), कार्तिकेय का मयूर नाग का भक्षक है तो नाग स्वयं गणेश जी के मूषक का शत्रु है। इतनी विषमताओं और विपरीत गुणों के बाद भी शिव परिवार शांतचित्त और प्रसन्न है। यह हमारे लिए संकेत है कि मानवीय जीवन भी विषमताओं और प्रतिकूलताओं से भरा होगा, लेकिन उन संघर्षों के बीच धैर्य और शांति से संतुलन बनाना ही वास्तविक 'शिवत्व' है।

महाशिवरात्रि: काल का महासंयोग

महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह रात्रि शिव और शक्ति के मिलन की रात है। वर्ष 2026 में यह महापर्व15 फरवरीको मनाया जा रहा है। इस वर्ष का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहशिवयोग, सौभाग्य योग और ध्रुव योगजैसे सात दुर्लभ संयोगों से युक्त है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो इस रात्रि को पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर गमन करती है। इसीलिए इस रात जागरण और रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठने का विशेष महत्व बताया गया है। निशीथ काल (अर्धरात्रि का समय) शाम 7:00 से 8:00 बजे के बीच इस बार विशेष फलदायी है, जो साधक की हर मन्नत पूरी करने का सामर्थ्य रखता है।

पंडित प्रदीप मिश्रा और पार्थिव शिवलिंग की महिमा

पंडित प्रदीप मिश्रा जी (सीहोर वाले) ने शिवमहापुराण की कथाओं के माध्यम से दार्शनिक साधना को जन-साधारण के लिए अत्यंत सरल बना दिया है। उनके अनुसार, स्वयं के हाथों से मिट्टी के माध्यम से महादेव को गढ़ना ही स्वयं को प्रकृति की जड़ों से जोड़ना है।

पार्थिव शिवलिंग निर्माण विधि

मिट्टी का चयन: किसी पवित्र स्थान, वृक्ष की जड़ या अपने घर के गमले की मिट्टी लें।
शुद्धिकरण: मिट्टी को गंगाजल से सींचकर पवित्र करें।
परिंडे (मटके) के जल का रहस्य: पंडित जी विशेष रूप से कहते हैं कि शिवलिंग बनाने हेतु जल अपनी रसोई के मटके (परिंडा) से लेना चाहिए। सनातन मान्यता में यहाँ माँ अन्नपूर्णा और हमारे पितरों का सूक्ष्म वास होता है। इस विधि से जल लेने पर महादेव के साथ पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है और घर के दोष समाप्त होते हैं।
आकार: मिट्टी से पहले जलाधारी और फिर शिवलिंग का निर्माण करें। निर्माण के समय 'श्री शिवाय नमस्तुभ्यं' मंत्र का निरंतर जाप करें।

शिवमहापुराण अनुसार संपूर्ण पूजन विधि

शिवमहापुराण के आलोक में पंडित प्रदीप मिश्रा जी द्वारा बताई गई पूजन विधि भक्ति और समर्पण का सरल मार्ग प्रशस्त करती है। अभिषेक का एक विशिष्ट और कल्याणकारी क्रम इस प्रकार है

जलाभिषेक: सबसे पहले शुद्ध जल से स्नान कराएं।
पंचामृत स्नान: इसके बाद क्रमशः कच्चा दूध, फिर दही, उसके उपरांत शुद्ध घी, फिर शहद और अंत में शक्कर (बुरा) अर्पित करना चाहिए।
अंतिम स्नान: पंचामृत के बाद पुनः शुद्ध जल से अभिषेक कर शिवलिंग को स्वच्छ करना अनिवार्य है।
त्रिपुंड और श्रृंगार: चंदन से शिवलिंग पर तीन रेखाएं (त्रिपुंड) बनाएं।

विशिष्ट पूजन सामग्री का अर्पण

अक्षत : 108 अखंडित (बिना टूटे) चावल के दाने।
गेहूं : 21 दाने (वंश वृद्धि और सुख के लिए)।
कमलगट्टे: 5 दाने (लक्ष्मी प्राप्ति हेतु)।
काली मिर्च: 21 दाने (रोग और शत्रु नाश हेतु)।
बेलपत्र: 7 या 11 पत्र। अर्पित करते समय बीच वाली पत्ती को पकड़कर, चिकना हिस्सा शिवलिंग की ओर रखें।
शमी पत्र: इसे स्वर्ण दान के समान माना गया है।
धतूरा: शिव को अति प्रिय, जो हमारे भीतर के विकारों का प्रतीक है।

ग्रीन महाशिवरात्रि: भक्ति का आधुनिक स्वरूप

आज के भौतिकतावादी युग में प्रकृति पूजा ही शिव की वास्तविक और व्यावहारिक पूजा है। यदि हम अपने पर्यावरण, नदियों और वायु को प्रदूषित कर रहे हैं, तो हम अनजाने में शिव के ही विराट स्वरूप का अपमान कर रहे हैं। जिस प्रकार भगवान शिव ने हलाहल विष का पान कर चराचर जगत की रक्षा की थी, उसी प्रकार हमारे आसपास के पेड़-पौधे जहरीली गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड) का अवशोषण कर हमें जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं; वे भी शिव का ही प्राकृतिक प्रतिरूप हैं।

इसीलिए सीहोर के कुबेरेश्वर धाम में इस बार 'ग्रीन महाशिवरात्रि' का क्रांतिकारी संकल्प लिया गया है। पंडित जी का यह सूत्र वैश्विक समाधान है। एक लोटा जल शिवलिंग पर और एक लोटा जल अपने आस-पास के पेड़-पौधों को। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जलवायु संकट का आध्यात्मिक उपचार है। जब हम एक पौधा लगाते हैं, तो हम साक्षात शिव के एक अंश की सेवा कर रहे होते हैं।

शिवत्व का अंगीकरण

अंततः, शिव की सार्थक आराधना केवल अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठाने और उसके संरक्षण में निहित है। महाशिवरात्रि का यह पर्व हमें मिट्टी से जुड़ने, जल को सहेजने और समस्त जीवों के प्रति करुणा भाव रखने की प्रेरणा देता है। जिस क्षण हम प्रकृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझकर उसके संवर्धन का व्रत ले लेंगे, उसी दिन से शिव अर्थात यह संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा हमारी संकल्प पूर्ति और आत्मिक कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो जाएगी। प्रकृति का संरक्षण ही साक्षात शिव का वंदन है। आइए, इस महाशिवरात्रि पर हम संकल्प लें कि हम अपने भीतर के 'शिव' को पहचानेंगे और इस 'पार्थिव' जगत को हरा-भरा बनाकर महादेव की सच्ची सेवा करेंगे।


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