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PM Modi Vision: विद्युत क्रांति की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भर भविष्य की मोदी दृष्टि

PM Modi Vision: विद्युत क्रांति की ओर बढ़ता भारत: आत्मनिर्भर भविष्य की मोदी दृष्टि

नीरज तिवारी (राजनीतिक विश्लेषक): भारत आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ ऊर्जा, पर्यावरण और आर्थिक आत्मनिर्भरता तीनों का संगम दिखाई दे रहा है। जिस प्रकार 20वीं सदी तेल आधारित अर्थव्यवस्था की थी, उसी प्रकार 21वीं सदी विद्युत, बैटरी और हरित ऊर्जा आधारित अर्थव्यवस्था की बनने जा रही है। ऐसे समय में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शी सोच केवल “इलेक्ट्रिक व्हीकल” तक सीमित नहीं है, बल्कि यह “ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत” की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। आज भारत जिस गति से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर बढ़ रहा है, वह केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं बल्कि आर्थिक, सामरिक और राष्ट्रीय परिवर्तन का संकेत है। भारत का EV पारितंत्र अब सब्सिडी आधारित शुरुआती चरण से निकलकर व्यापक जन-स्वीकार्यता और नियामक व्यवस्था के युग में प्रवेश कर चुका है। दिल्ली की EV नीति 2.0, CAFE-3 मानदंड, चार्जिंग अवसंरचना का विस्तार और बैटरी निर्माण में आत्मनिर्भरता ये सभी संकेत देते हैं कि भारत आने वाले दशक में वैश्विक हरित अर्थव्यवस्था का बड़ा केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने समय रहते यह समझ लिया था कि यदि भारत को वास्तव में आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करनी होगी। आज भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। वैश्विक युद्ध, पश्चिम एशिया संकट, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक अस्थिरता सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। ऐसे में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी केवल पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है।

भारत में वर्ष 2026 तक EV बिक्री में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होना इस बात का संकेत है कि जनता अब धीरे-धीरे विद्युत आधारित परिवहन को स्वीकार कर रही है। दोपहिया और तिपहिया वाहनों में यह परिवर्तन सबसे तेजी से दिखाई दे रहा है। दिल्ली EV नीति 2.0 में जनवरी 2027 तक ICE तीनपहिया वाहनों और अप्रैल 2028 तक ICE दोपहिया वाहनों के नए पंजीकरण पर रोक का प्रस्ताव भारत के भविष्य की दिशा स्पष्ट करता है। यह केवल कानून नहीं बल्कि आने वाले भारत की झलक है।

आज दुनिया का सबसे बड़ा संघर्ष “ऊर्जा नियंत्रण” को लेकर है। जिस देश के पास ऊर्जा संसाधन और तकनीक होगी, वही भविष्य की वैश्विक शक्ति बनेगा। प्रधानमंत्री मोदी इसी दृष्टिकोण के साथ मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत और  ग्रीन ग्रोथ को आगे बढ़ा रहे हैं। भारत केवल EV खरीदने वाला बाजार न बने, बल्कि बैटरी, मोटर, चार्जर, सेमीकंडक्टर और ऊर्जा भंडारण तकनीकों का वैश्विक निर्माण केंद्र बने यह वर्तमान नीति का मूल उद्देश्य दिखाई देता है। भारत सरकार की पीएम ई-ड्राइव योजना, FAME-II, ACC बैटरी PLI योजना, पीएम ई-बस सेवा योजना और चार्जिंग नेटवर्क विस्तार इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा हैं। सरकार ने EV और चार्जिंग स्टेशनों पर GST घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है, जिससे आम उपभोक्ता के लिए यह तकनीक सुलभ बन सके। इसके साथ-साथ नई इमारतों में 20 प्रतिशत पार्किंग स्थानों पर EV चार्जिंग व्यवस्था अनिवार्य करना भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उठाया गया अत्यंत महत्त्वपूर्ण कदम है।
हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी कम नहीं हैं। भारत में चार्जिंग स्टेशनों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन अभी भी वैश्विक मानकों की तुलना में काफी कम है। बैटरियों के लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे खनिजों के आयात पर निर्भरता भारत के लिए दीर्घकालिक चुनौती है। यदि भारत को वास्तविक आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है, तो उसे केवल वाहन निर्माण तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि बैटरी के “रसायनिक स्तर” तक स्वदेशीकरण करना होगा। यही कारण है कि आज  रेयर अर्थ कॉरिडोर,बैटरी रीसाइक्लिंग, सॉलिड-स्टेट बैटरियों और सोडियम-आयन तकनीक पर ध्यान बढ़ाना समय की आवश्यकता बन चुका है। भारत यदि इन क्षेत्रों में अनुसंधान और उत्पादन क्षमता विकसित कर लेता है, तो वह आने वाले वर्षों में चीन जैसी वैश्विक निर्भरता से मुक्त होकर स्वयं विश्व बाजार का नेतृत्व कर सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी की नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वे केवल “वाहनों के विद्युतीकरण” की बात नहीं कर रहे, बल्कि सम्पूर्ण ऊर्जा व्यवस्था को बदलने की दिशा में कार्य कर रहे हैं। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी स्टोरेज, स्मार्ट ग्रिड और EV ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए स्तंभ हैं। यदि भारत की बिजली कोयले से बनेगी और वाहन केवल इलेक्ट्रिक कहलाएँगे, तो वास्तविक कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं आएगी। इसलिए नवीकरणीय ऊर्जा और EV का तालमेल अत्यंत आवश्यक है।

आज भारत “अखंड भारत” की सोच केवल भौगोलिक अर्थों में नहीं बल्कि आर्थिक और तकनीकी शक्ति के रूप में भी आगे बढ़ा रहा है। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ है भारत अपनी ऊर्जा स्वयं उत्पन्न करे, अपनी बैटरियाँ स्वयं बनाए, अपनी तकनीक विकसित करे और विश्व को निर्यात भी करे। यही वह मॉडल है जो भारत को आने वाले समय में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि ऊर्जा और तकनीक के क्षेत्र में भी महाशक्ति बना सकता है। भारी माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में EV परिवर्तन विशेष महत्त्व रखता है। ट्रक भले कुल वाहनों का केवल 3 प्रतिशत हों, लेकिन परिवहन उत्सर्जन में उनका योगदान 44 प्रतिशत तक है। यदि भारत इस क्षेत्र में ई-ट्रक कॉरिडोर, मेगावाट चार्जिंग सिस्टम और बैटरी स्वैपिंग मॉडल को सफलतापूर्वक लागू कर देता है, तो यह वैश्विक स्तर पर हरित लॉजिस्टिक्स का उदाहरण बन सकता है।

भारत की युवा आबादी, विशाल बाजार, बढ़ती तकनीकी क्षमता और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति आज देश को ऐसे मुकाम पर खड़ा कर रही है, जहाँ वह ऊर्जा क्रांति का नेतृत्व कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि इसी दिशा में दिखाई देती है कि आने वाले वर्षों में भारत केवल “उपभोक्ता राष्ट्र” नहीं रहेगा, बल्कि तकनीकी और औद्योगिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र बनेगा।

अंततः यह स्पष्ट है कि इलेक्ट्रिक वाहन केवल एक परिवहन विकल्प नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक स्वाभिमान, पर्यावरणीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वतंत्रता का आधार बनते जा रहे हैं। यदि भारत समय रहते बैटरी निर्माण, चार्जिंग अवसंरचना, अनुसंधान, खनिज सुरक्षा और हरित ऊर्जा पर व्यापक निवेश करता है, तो आने वाला दशक “ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत” का दशक सिद्ध हो सकता है। भारत अब पेट्रोल और डीज़ल आधारित निर्भरता से आगे बढ़कर “विद्युत आधारित विकसित राष्ट्र” बनने की दिशा में बढ़ रहा है। यह केवल नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय परिवर्तन है और इसी परिवर्तन में भविष्य के आत्मनिर्भर, समृद्ध और शक्तिशाली भारत की नींव छिपी हुई है.....

नीरज तिवारी
(शिक्षाविद, राजनीतिक विश्लेषक एवं सामाजिक विचारक)


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