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जनरेटर चला ही नहीं, फिर भी देना होगा 69 लाख किराया! हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

जनरेटर चला ही नहीं, फिर भी देना होगा 69 लाख किराया! हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चुनाव के दौरान लगाए गए जनरेटर के किराए को लेकर करीब 13 साल पुराने विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी जनरेटर को तय जगह पर स्थापित करके उसे जरूरत पड़ने पर तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार रखना भी संविदा के तहत सेवा उपलब्ध कराने का हिस्सा है। ऐसे में केवल यह कहकर भुगतान रोका नहीं जा सकता कि बिजली जाने के दौरान जनरेटर को चलाने की जरूरत नहीं पड़ी।

मामला 2013 के विधानसभा चुनाव और 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान कोंडागांव जिले में की गई व्यवस्थाओं से जुड़ा है। हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने निर्वाचन आयोग की अपील को खारिज करते हुए कमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें ठेकेदार को जनरेटर के किराए की राशि ब्याज समेत देने का निर्देश दिया गया था।

चुनाव के लिए जारी हुआ था टेंडर

चुनाव के दौरान कोंडागांव जिला निर्वाचन कार्यालय ने टेंट, लाइट, माइक, जनरेटर समेत कई जरूरी व्यवस्थाओं के लिए टेंडर जारी किया था। यह काम निलेश टेंट हाउस को मिला था। ठेकेदार की ओर से दोनों चुनावों की व्यवस्थाओं के बाद करीब 1.19 करोड़ रुपये के बिल प्रस्तुत किए गए। हालांकि, विभाग की ओर से इन बिलों का अधिकांश भुगतान रोक दिया गया। विवाद बढ़ने पर जनरेटर के किराए का भुगतान भी सवालों के घेरे में आ गया।

जनरेटर इस्तेमाल नहीं हुआ, इसलिए भुगतान रोका

निर्वाचन विभाग ने जनरेटर के किराए के दावे पर आपत्ति जताते हुए कहा कि चुनाव के दौरान बिजली जाने की स्थिति में जनरेटर का वास्तविक इस्तेमाल नहीं हुआ। इसी आधार पर जनरेटर का किराया देने से इनकार किया गया।इसके बाद ठेकेदार ने बकाया राशि की वसूली के लिए कमर्शियल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के बाद कोर्ट ने जनरेटर के किराए के तौर पर 69 लाख 69 हजार 375 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया।इसके अलावा 31 मार्च 2016 से वास्तविक भुगतान होने तक 6.75 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का भी निर्देश दिया गया।

हाईकोर्ट में पहुंचा मामला

कमर्शियल कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ निर्वाचन आयोग ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में अपील दायर की। आयोग की ओर से जनरेटर के वास्तविक उपयोग नहीं होने सहित अन्य आधारों पर भुगतान के आदेश को चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सुषमा सावंत की डिविजन बेंच ने की।

जनरेटर तैयार रखना भी सेवा का हिस्सा

हाईकोर्ट ने मामले में संविदा की शर्तों को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, टेंडर में जनरेटर के किराए की दर 885 रुपये प्रति किलोवाट प्रतिदिन तय की गई थी। ठेकेदार की जिम्मेदारी केवल जनरेटर चलाने तक सीमित नहीं थी। उसे निर्धारित स्थल पर जनरेटर स्थापित करके उसे ऐसी स्थिति में रखना था कि बिजली की जरूरत पड़ते ही उसका इस्तेमाल किया जा सके। यानी सेवा का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होगा कि मशीन कितने समय चली, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि ठेकेदार ने अनुबंध के मुताबिक मशीन उपलब्ध और चालू हालत में रखी थी या नहीं।

सिर्फ स्विच ऑन नहीं होने से किराया नहीं रोका जा सकता

हाईकोर्ट ने माना कि अगर ठेकेदार ने अनुबंध के अनुसार जनरेटर को साइट पर लगाकर इस्तेमाल के लिए तैयार रखा था, तो सिर्फ इस वजह से उसका निर्धारित किराया रोका नहीं जा सकता कि बिजली जाने के दौरान जनरेटर चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। इस तरह कोर्ट ने 'वास्तविक उपयोग' और 'सेवा उपलब्ध रखने' के बीच अंतर को स्पष्ट किया।

समय-सीमा पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी

निर्वाचन आयोग की ओर से वसूली के दावे की समय-सीमा को लेकर भी सवाल उठाया गया था। हाईकोर्ट ने इस आपत्ति को भी स्वीकार नहीं किया।कोर्ट ने माना कि विभाग ने ठेकेदार के बिलों पर अंतिम निर्णय 31 मार्च 2016 को लिया था। इसके बाद ठेकेदार ने तीन साल की निर्धारित अवधि के भीतर 27 मार्च 2019 को मुकदमा दायर किया था। इसलिए दावा समय-सीमा से बाहर नहीं माना जा सकता।

निर्वाचन आयोग की अपील खारिज

सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट की डिविजन बेंच ने निर्वाचन आयोग की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही कमर्शियल कोर्ट द्वारा ठेकेदार को जनरेटर किराए के रूप में 69.69 लाख रुपये और निर्धारित ब्याज देने का आदेश बरकरार रहा। इस फैसले में संविदा की शर्तों के पालन को अहम माना गया है। कोर्ट की टिप्पणी का मूल आधार यह है कि किसी सेवा को उपलब्ध और उपयोग के लिए तैयार रखना भी अनुबंध के तहत निर्धारित जिम्मेदारी हो सकती है, भले ही परिस्थितियों के कारण उस सेवा का वास्तविक इस्तेमाल न हुआ हो।


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