बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में विकास की संभावनाओं और स्थानीय समस्याओं को लेकर आयोजित हरिभूमि-INH के विशेष कार्यक्रम ‘जिला संवाद’ में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और औद्योगिक विकास से जुड़े कई अहम मुद्दे सामने आए। जिले की विकास यात्रा पर चर्चा के दौरान व्यापार, उद्योग और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलताओं पर भी सवाल उठाए।
जिला मुख्यालय स्थित माहेश्वरी भवन में आयोजित इस संवाद में हरिभूमि-INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े प्रतिनिधियों के साथ सवाल-जवाब किए। चर्चा में प्रमुख रूप से बालोद में सीबीएसई स्कूलों की उपलब्धता, कृषि महाविद्यालय की जरूरत, नर्सिंग और बीएड कॉलेज की कमी, विशेषज्ञ डॉक्टरों की अनुपलब्धता, उद्योगों की स्थापना में आ रही बाधाओं और दल्लीराजहरा के भविष्य जैसे विषय शामिल रहे।
संवाद से यह बात उभरकर आई कि केवल भवन और संसाधन उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। जिले में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रशिक्षित मानव संसाधन, रोजगार के अवसर और उद्योगों के अनुकूल वातावरण तैयार करना भी जरूरी है।
बालोद में केंद्रीय विद्यालय का इंतजार, बच्चों की पढ़ाई के लिए परिवारों को होना पड़ता है परेशान
जिला संवाद के दौरान शिक्षा के मुद्दे पर चर्चा करते हुए प्रतिनिधियों ने बताया कि बालोद में सीबीएसई आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के पर्याप्त विकल्पों की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही है। केंद्रीय विद्यालय खोलने की पहल की चर्चा वर्षों से होती रही है, लेकिन स्थान चयन और अन्य कारणों से इसकी शुरुआत नहीं हो सकी है।
सवाल-जवाब के दौरान यह मुद्दा उठा कि जब जिले में शिक्षा की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध नहीं होंगी, तो अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के लिए दूसरे शहरों का रुख करने को मजबूर होंगे।
व्यापार और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधि प्रदीप जैन ने बताया कि इसी जरूरत को देखते हुए वर्ष 2019 में कुछ समान विचारधारा वाले लोगों ने मिलकर अरिहंत एकेडमी की स्थापना की थी। उनके अनुसार, स्थानीय लोगों के सहयोग से विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या बढ़कर लगभग 600 तक पहुंच गई है और स्कूल को कक्षा 12वीं तक सीबीएसई संबद्धता प्राप्त है।
हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि छोटे शहरों में अनुभवी और योग्य शिक्षकों को आकर्षित करना आसान नहीं है। बड़े शहरों में बेहतर सुविधाएं और परिवार के लिए शिक्षा के अधिक विकल्प मिलने के कारण शिक्षक बालोद में लंबे समय तक काम करने से हिचकते हैं।
कृषि प्रधान जिले में कृषि कॉलेज क्यों नहीं? उच्च शिक्षा पर उठा बड़ा सवाल
बालोद जिले की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में यहां कृषि महाविद्यालय की जरूरत को लेकर भी जिला संवाद में चर्चा हुई।
प्रतिनिधियों ने कहा कि कृषि शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को दुर्ग, भिलाई और रायपुर जैसे शहरों में जाना पड़ता है। निजी संस्थानों की फीस कई परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बन सकती है, जिससे ग्रामीण और मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों के सामने आगे की पढ़ाई जारी रखने में मुश्किलें आती हैं।
प्रदीप जैन ने मांग रखी कि बालोद में अगले शैक्षणिक वर्ष से कृषि महाविद्यालय शुरू करने की दिशा में पहल की जानी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए जिले में उपलब्ध पुरानी सरकारी इमारतों या स्कूल भवनों की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है।
चर्चा में बीएड कॉलेज और सरकारी नर्सिंग कॉलेज की कमी का मुद्दा भी उठा। प्रतिनिधियों का कहना था कि शिक्षक बनने की तैयारी करने वाले युवाओं और नर्सिंग के क्षेत्र में करियर बनाने की इच्छुक छात्राओं को भी जिले से बाहर जाकर पढ़ाई करनी पड़ती है।
उनके मुताबिक, स्थानीय स्तर पर व्यावसायिक और रोजगारोन्मुखी शिक्षा के अवसर बढ़ने से विद्यार्थियों को राहत मिलेगी और जिले को प्रशिक्षित युवा भी उपलब्ध हो सकेंगे।
उद्योग लगाने में पंचायत की एनओसी बनी बाधा, इंडस्ट्रियल पार्क की मांग
बालोद में औद्योगिक विकास की संभावनाओं पर चर्चा के दौरान उद्योगपतियों ने बताया कि नए उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन और जरूरी अनुमतियां हासिल करना बड़ी चुनौती है।
एक उद्योग प्रतिनिधि ने कहा कि उद्योग लगाने के लिए संबंधित ग्राम पंचायत की अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) की जरूरत पड़ती है। कई बार स्थानीय स्तर पर प्रदूषण की आशंका और अन्य कारणों से विरोध का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में निवेश की योजना आगे बढ़ाना मुश्किल हो जाता है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जिले में नियोजित औद्योगिक पार्क विकसित किया जाए, जहां उद्योगों के लिए जमीन और जरूरी बुनियादी सुविधाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हों।
चर्चा में यह भी कहा गया कि मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में सिंगल विंडो व्यवस्था के उदाहरणों से सीख लेते हुए छत्तीसगढ़ में भी अनुमतियों की प्रक्रिया को आसान बनाने पर विचार किया जाना चाहिए।
उद्योग प्रतिनिधियों का मानना था कि यदि निवेशकों को स्पष्ट नियम, समयबद्ध मंजूरी और उपयुक्त औद्योगिक भूमि मिले, तो जिले में नए उद्योग स्थापित करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
25 एकड़ जमीन पर उद्योग स्थापित करने की योजना का भी हुआ जिक्र
संवाद में दल्लीराजहरा के आसपास उद्योगों के लिए जमीन उपलब्ध कराने से जुड़ा अनुभव भी साझा किया गया। एक प्रतिनिधि के मुताबिक, लगभग 50 एकड़ जमीन से जुड़ी योजना के तहत करीब 25 एकड़ भूमि का चयन किया गया था, लेकिन जनसुनवाई में विरोध के कारण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका।
उन्होंने कहा कि यदि उस क्षेत्र में उद्योग स्थापित हो जाते, तो स्थानीय स्तर पर सैकड़ों रोजगार के अवसर पैदा हो सकते थे। हालांकि, जमीन और प्रस्ताव से जुड़े इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि कार्यक्रम में प्रस्तुत जानकारी से अलग से नहीं की गई है।
इस चर्चा के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आया—क्या बालोद जिले में विकास को लेकर सभी पक्षों के बीच एक साझा सहमति बन पाई है? एक ओर स्थानीय लोग रोजगार और उद्योग चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में उद्योगों से होने वाले संभावित प्रदूषण को लेकर विरोध भी सामने आता है।
ऐसे में औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।
स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ीं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रशिक्षित स्टाफ की कमी
स्वास्थ्य सेवाओं पर चर्चा करते हुए एक चिकित्सक प्रतिनिधि ने कहा कि जिला बनने के बाद बालोद में स्वास्थ्य सुविधाओं में कुछ सकारात्मक बदलाव आए हैं। पहले छोटी-छोटी चिकित्सा जरूरतों के लिए भी लोगों को दुर्ग, भिलाई और रायपुर जाना पड़ता था।
हालांकि, गंभीर बीमारियों और आपातकालीन परिस्थितियों में अब भी विशेषज्ञ डॉक्टरों, उनकी टीम और प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की कमी महसूस होती है। आवश्यक विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होने पर मरीजों को दूसरे शहरों में रेफर करना पड़ता है।
प्रतिनिधियों ने कहा कि अस्पतालों में भवन और मशीनें उपलब्ध होने के साथ-साथ योग्य डॉक्टरों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की नियुक्ति भी जरूरी है। तभी स्थानीय स्तर पर गंभीर मरीजों का बेहतर उपचार संभव हो सकेगा।
सवाल: दूसरे शहरों के डॉक्टर बालोद में आकर बसने से क्यों हिचकते हैं?
इस सवाल के जवाब में चिकित्सक प्रतिनिधि ने बताया कि डॉक्टरों के लिए केवल नौकरी या आय ही महत्वपूर्ण नहीं होती। वे अपने परिवार और बच्चों की शिक्षा, जीवनशैली, मनोरंजन तथा अन्य सुविधाओं को भी ध्यान में रखते हैं।
उनके अनुसार, बालोद में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के पर्याप्त विकल्प और मनोरंजन की सुविधाएं बढ़ाई जाएं, तो बाहर से आने वाले पेशेवरों के लिए यहां लंबे समय तक रहना अधिक सुविधाजनक हो सकता है।
यह चर्चा इस ओर भी संकेत करती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करने के लिए चिकित्सा संस्थानों के साथ-साथ शहर की समग्र सुविधाओं में सुधार जरूरी है।
सरकारी नर्सिंग कॉलेज खुलने से स्थानीय युवाओं को मिल सकता है रोजगार
जिला संवाद में सरकारी नर्सिंग कॉलेज की स्थापना की मांग को भी प्रमुखता से उठाया गया। प्रतिनिधियों का कहना था कि बालोद में नर्सिंग की पढ़ाई के लिए सरकारी संस्थान शुरू होने से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के विद्यार्थियों को लाभ मिल सकता है।
प्रदीप जैन ने सुझाव दिया कि जिला अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं और प्रशिक्षण की संभावनाओं का उपयोग करते हुए सरकारी नर्सिंग कॉलेज शुरू करने पर विचार किया जाए।
उन्होंने कहा कि स्थानीय छात्राओं को नर्सिंग की शिक्षा मिलने से उन्हें रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, अस्पतालों और निजी स्वास्थ्य संस्थानों को भी प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता में मदद मिल सकती है।
इस मांग को जिले की स्वास्थ्य सेवाओं और रोजगार, दोनों से जोड़कर देखा गया।
दल्लीराजहरा के भविष्य पर चिंता, रोजगार और बुनियादी सुविधाओं पर जोर
जिला संवाद में दल्लीराजहरा की स्थिति और भविष्य को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। प्रतिनिधियों ने रोजगार के अवसर कम होने, आबादी में गिरावट और शहर की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ने वाले प्रभावों की ओर ध्यान दिलाया।
चर्चा में दावा किया गया कि दल्लीराजहरा से जुड़े खनन क्षेत्र के कारण जिला खनिज न्यास (DMF) के माध्यम से जिले को बड़ी राशि प्राप्त होती रही है। प्रतिनिधियों ने सवाल उठाया कि खनन से प्रभावित क्षेत्र में विकास और सुविधाओं के लिए पर्याप्त खर्च सुनिश्चित किया जा रहा है या नहीं।
उनका कहना था कि यदि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो शहर की आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
इस दौरान यह भी कहा गया कि दल्लीराजहरा जैसे क्षेत्रों के लिए ऐसी विकास योजना जरूरी है, जो स्थानीय जरूरतों और वहां के लोगों की आजीविका को प्राथमिकता दे।
कृषि आधारित उद्योगों में बालोद के विकास की संभावनाएं
औद्योगिक विकास के संभावित क्षेत्रों पर चर्चा करते हुए प्रतिनिधियों ने कृषि आधारित उद्योगों को बालोद के लिए उपयोगी विकल्प बताया।
जिले में कृषि उत्पादन और धान मिलों से जुड़ी गतिविधियों को देखते हुए खाद्य प्रसंस्करण, कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन और कृषि अवशेषों के उपयोग से संबंधित उद्योगों की संभावनाओं पर विचार करने की बात कही गई।
चर्चा में धान मिलों से निकलने वाले अवशेष और भूसे जैसे पदार्थों के औद्योगिक उपयोग का भी उल्लेख किया गया। प्रतिनिधियों का मानना था कि इस क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने से स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकता है और रोजगार के नए अवसर तैयार हो सकते हैं।
हालांकि, ऐसे उद्योगों के विकास के लिए जमीन, बाजार, निवेश, तकनीक और सरकारी अनुमतियों की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।