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दशहरे में नहीं देख पाए नीलकंठ और ना ही मिली सोनपत्ती

By Rajeev Kumar

छत्तीसगढ़ खबर | Published On: 30 Sep, 2017 | 7:48 AM GMT 05:30+

दशहरे में नहीं देख पाए नीलकंठ और ना ही मिली सोनपत्ती

कांक्रीट के जंगलों ने छीनी त्योहारी परंपराएं

रायपुर। प्रदूषण की समस्या शहरों ही नहीं, बल्कि गांवों में भी पहुंच गई है। खेतों में इस्तेमाल होने वाले रासायन और कीटनाशक से पक्षियों के खानपान पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

शहरीकरण के चलते प्राकृतिक जंगल धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। इससे पशु-पक्षियों का बसेरा भी खत्म हो रहा है। इस साल तो दशहरे पर शुभ माने जाने वाले नीलकंठ के दर्शन भी नसीब नहीं हुए। धार्मिक मान्यताओं वाले नीलकंठ पक्षी के दर्शन नहीं होने से लोग निराश हो गए।

नीलकंठ को देखना शुभ

घर आंगन में गौरैया चिड़िया का चहकना, नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की तर्ज पर दशहरे के दिन नीलकंठ को देखना शुभ होता है। लोग सुबह से ही अगल बगल के पेड़ों पर झांकते नजर आए, पर देर शाम तक उन्हें एक भी नीलकंठ नहीं दिखाई दिया। गांवों में तो बड़ी संख्या में ये पक्षी मिल जाते थे, लेकिन बीते कुछ सालों से तो इनका दिखना ही बंद हो गया है।  

पर्यावरण विशेषज्ञ नितिन सिंघवी कहते है कि जिस तरह से गौरैया चिड़िया का घरों के आंगन में चहकना बंद हो गया है, उसी तरह से अन्य पक्षियों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही, जिसमें कबूतर और कौए भी शामिल हैं। शहरों से तो लगभग यह गायब ही हो गए है। गुजरे वर्षों में तो तमाम पक्षी पालक दशहरा वाले दिन नीलकंठ पक्षी को लेकर आते थे, पर अबकी तो शहर में कहीं भी न तो नीलकंठ पक्षी देखने को मिला और न ही पक्षीपालक, जबकि धार्मिक मान्यताओं में नीलकंठ पक्षी के प्रति गहरी आस्था है।

और ना ही मिला सोनपत्र

दशहरे में सोन पेड़ की पत्तियों का विशेष महत्व रहा है। इस दिन बड़े बुजुर्गों को सोनपत्र देकर आशीर्वाद लिया जाता है। इसके लिए हर साल दशहरे के दिन इस पत्ती की मांग बहुत बढ़ जाती है, लेकिन अब शहरीकरण की मार से सोन के पेड़ भी बड़ी संख्या में कटे हैं।

मयंक ठाकुर की रिपोर्ट

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