सोनम वांगचुक बोले- शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को दबाना सरकार के लिए नुकसानदेह, लद्दाख को अधिकार देने की उठाई मांग

Sonam Wangchuk News: लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक ने लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और देश की आंतरिक सुरक्षा को लेकर अहम बातें कही हैं। मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों के लिए फीडबैक का काम करते हैं। यदि जनता की असहमति को दबाया जाता है और उसकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जाता है, तो इससे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है। उन्होंने लद्दाख में स्थानीय लोगों को अधिक अधिकार देने के साथ-साथ सीमाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की जरूरत पर भी जोर दिया।

Sonam Wangchuk Statement: प्रदर्शन लोकतंत्र में फीडबैक का काम करते हैं

मुंबई में अपने संबोधन के दौरान सोनम वांगचुक ने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जनता की चिंताओं और नाराजगी को सरकार तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उनके मुताबिक, जब लोग सरकार की नीतियों से असहमत होते हैं, तो उन्हें अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए।

वांगचुक ने तर्क दिया कि विरोध की आवाज को दबाने से समस्या खत्म नहीं होती, बल्कि असंतोष और गहरा हो सकता है। उन्होंने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए जन आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब लोगों को अपनी नाराजगी जाहिर करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो परिस्थितियां गंभीर रूप ले सकती हैं।

उन्होंने सरकारों को सलाह दी कि समस्याओं की ओर ध्यान दिलाने वाले लोगों को निशाना बनाने के बजाय उन मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए, जिनकी वजह से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

लोकतंत्र में संसद के पास प्रदर्शन की अनुमति क्यों जरूरी?

सोनम वांगचुक ने ब्रिटेन, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि कई लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में संसद के आसपास नागरिकों को अपनी मांगें और विरोध दर्ज कराने का अवसर मिलता है।

उन्होंने भारत में प्रदर्शन स्थलों की स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि दिल्ली में जंतर-मंतर संसद भवन से काफी दूर है। उनके अनुसार, प्रदर्शन स्थलों को जनप्रतिनिधियों और संसद से दूर रखने से जनता की आवाज सीधे सरकार तक पहुंचाने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

वांगचुक का मानना है कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसे माध्यम उपलब्ध होने चाहिए, जिनसे आम नागरिक अपनी समस्याओं को प्रभावी ढंग से सरकार के सामने रख सकें।

अर्धसैनिक बलों की तैनाती पर उठाए सवाल

अपने संबोधन में वांगचुक ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आंतरिक कानून-व्यवस्था संभालने और सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच उचित संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

उन्होंने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की भूमिका और उनकी तैनाती की प्राथमिकताओं पर चर्चा करते हुए कहा कि देश की सीमाओं की सुरक्षा को पर्याप्त महत्व दिया जाना चाहिए।

वांगचुक के मुताबिक, सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सुरक्षा बलों के संसाधनों और जिम्मेदारियों का इस्तेमाल इस तरह होना चाहिए कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों, दोनों का ध्यान रखा जा सके।

लद्दाख में चीन की गतिविधियों का किया जिक्र

लद्दाख की भौगोलिक स्थिति और वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सुरक्षा चुनौतियों का उल्लेख करते हुए सोनम वांगचुक ने चीन की कथित 'सलामी स्लाइसिंग' रणनीति पर चिंता जताई।

'सलामी स्लाइसिंग' का मतलब किसी क्षेत्र में धीरे-धीरे छोटे-छोटे कदमों के जरिए रणनीतिक बढ़त हासिल करने की नीति से है। वांगचुक ने अपने अनुभवों के आधार पर दावा किया कि सीमा पर ध्यान और संसाधनों के बंटवारे का फायदा उठाकर चीन आगे बढ़ने की कोशिश कर सकता है।

उन्होंने कहा कि लद्दाख जैसे संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत रखना बेहद जरूरी है। हालांकि, चीन की गतिविधियों को लेकर उनके इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित आधिकारिक जानकारी देखना आवश्यक है।

लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग फिर उठाई

सोनम वांगचुक लंबे समय से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग उठा रहे हैं। उनका कहना है कि सीमावर्ती क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अपने प्राकृतिक संसाधनों, जमीन, संस्कृति और विकास से जुड़े फैसलों में अधिक भागीदारी मिलनी चाहिए।

संविधान की छठी अनुसूची में शामिल क्षेत्रों को जनजातीय स्वशासन से जुड़े विशेष प्रावधान मिलते हैं। लद्दाख को इसमें शामिल करने की मांग का उद्देश्य स्थानीय समुदायों की पहचान, भूमि और पारंपरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना है।

वांगचुक के अनुसार, स्थानीय लोगों को अपने क्षेत्र के भविष्य से जुड़े फैसले लेने का अधिकार मिलने से विकास और सुरक्षा, दोनों को मजबूती मिल सकती है।

दिल्ली मार्च और हिरासत के अनुभवों का भी संदर्भ

वांगचुक ने अपने विचार रखते हुए दिल्ली मार्च और हिरासत से जुड़े अनुभवों का भी संदर्भ दिया। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति के लिए जगह बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया।

उनका कहना है कि चुनी हुई सरकारों को नागरिकों की चिंताओं को गंभीरता से सुनना चाहिए। शांतिपूर्ण संवाद के माध्यम से विवादों का समाधान करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के हित में है।

उनके संबोधन का प्रमुख संदेश यही रहा कि नागरिकों की आवाज सुनना, स्थानीय समुदायों को अधिकार देना और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। इन सभी पहलुओं के बीच संतुलन बनाकर ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

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